माता लक्ष्मी,ने बताया रोज घर मे झाड़ू लगाने वाली,घर में बार-बार झाड़ू लगाने से क्या होता है?

नमस्कार मित्रों, माता लक्ष्मी ने स्वयं बताया है कि घर में रोज झाड़ू लगाने वाली औरतें अनजाने में कौन सा पाप कर बैठती हैं और कौन सी तीन तरह की झाड़ू भूलकर भी घर में नहीं रखनी चाहिए। वरना भयंकर गरीबी घर में आती है। घर में पड़ी एक साधारण सी झाड़ू भी आपके भाग्य को ऊपर उठा सकती है या फिर नीचे गिरा सकती है।

शास्त्रों में झाड़ू को माता लक्ष्मी का रूप माना गया

झाड़ू से जुड़ी छोटी-छोटी गलतियां इंसान को कंगाली की ओर धकेल देती हैं। झाड़ू को गलत दिशा में या गलत समय पर रखना माता लक्ष्मी की बहन अलक्ष्मी को आकर्षित करता है। जो दरिद्रता और संकटों की प्रतीक मानी जाती है।

झाड़ू से जुड़े कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें भूलकर भी नहीं करना चाहिए।

एक नगर में गंगाधर नाम का एक सम्मानित ब्राह्मण अपनी धर्म परायण पत्नी कमला देवी के साथ रहता था। गंगाधर भगवान श्री विष्णु का परम भक्त था। वह रोज सुबह तुलसी माता को जल चढ़ाकर पूजा करता।

पत्नी भी उतनी ही विनम्र और धर्मनिष्ठ थी। उनका जीवन धन, सुख और सम्मान से भरा था। लेकिन संतान का अभाव उन्हें भीतर से दुखी करता रहता था। उन्होंने अनेक व्रत, पूजा और मन्नतें की और अंततः भगवान की कृपा से उनके घर एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया।

नाम प्रिया रखा गया। माता-पिता की वह अत्यंत लाडली बन गई। उसकी हर इच्छा पूरी की जाती थी। यही अत्यधिक दुलार धीरे-धीरे उसके स्वभाव को बिगाड़ने लगा। समय के साथ प्रिया आलसी, घमंडी और अभिमानी हो गई। वो घर के बड़ों और नौकरों तक का अपमान करने लगी। साफ सफाई से उसे नफरत थी।

उसने कभी झाड़ू तक नहीं उठाई। माता-पिता चिंतित रहते पर उन्हें लगता कि विवाह के बाद सब ठीक हो जाएगा। जब प्रिया 16 वर्ष की हुई तो उसके लिए अच्छे घरों से रिश्ते आए। लेकिन वह हर लड़के का अपमान कर देती। उसके व्यवहार से पूरा नगर परेशान रहने लगा।

इसी बीच एक दिन वो अपनी सहेलियों के साथ बन गई। जहां उसकी नजर एक गरीब लेकिन शांत स्वभाव वाले ब्राह्मण युवक हरिदास पर पड़ी। वह विद्वान संयमी और भगवान विष्णु का सच्चा भक्त था। प्रिया पहली बार किसी के व्यक्तित्व से आकर्षित हुई। घर लौटते ही उसने पिता से कहा कि वह उसी ब्राह्मण युवक से विवाह करेगी।

गंगाधर और कमला देवी चकित हुए पर बेटी की जिद के आगे मान गए। हरिदास ने पहले मना किया लेकिन गंगाधर की आश्वासन पर विवाह के लिए तैयार हो गया। विवाह भव्य रूप से संपन्न हुआ।

विदाई के समय प्रिया की मां ने उसे एक झाड़ू दी और कहा कि यह शुभ होती है और लक्ष्मी वास का प्रतीक है। लेकिन प्रिया ने उसे बिना सम्मान एक तरफ रख दिया। गंगाधर ने बेटी के लिए घर और दुकान की व्यवस्था कर दी।

शुरुआत में सब ठीक रहा लेकिन जल्द ही प्रिया का असली स्वभाव सामने आ गया। वह घर का कोई काम नहीं करती। घर गंदगी से भरने लगा। सास समझाती रही। पति भी विनम्रता से समझाता रहा।

लेकिन प्रिया पर कोई असर नहीं हुआ। उसका व्यवहार दिन पर दिन कठोर होता गया और घर का वातावरण बिगड़ने लगा। कुछ ही समय बाद हरिदास ने छोटी सी किराने की दुकान संभाल ली। वह मेहनती था लेकिन घर का बिगड़ा माहौल, गंदगी और पत्नी का घमंड उसके मन को तोड़ता जा रहा था।

घर में ना साफ सफाई थी ना शांति।

इसका असर उसके व्यापार पर भी पड़ने लगा। ग्राहक कम होते गए। जो कभी कभार आता भी वह घर की अव्यवस्था और तनाव देखकर रुकता नहीं था। एक दिन व्यापार के सिलसिले में हरिदास को दूसरे नगर जाना पड़ा। वह सुबह सवेरे बिना कुछ कहे निकल गया।

उसी दिन उसकी बूढ़ी मां पुराने झाड़ू से घर साफ कर रही।

झाड़ू उसके लिए सिर्फ एक वस्तु नहीं बल्कि माता लक्ष्मी का प्रतीक थी। तभी प्रिया की नजर उस झाड़ू पर पड़ी। उसे अपनी मां की दी हुई झाड़ू याद आ गई। वह अपनी झाड़ू लाकर सास को देते हुए व्यंग में बोली कि अब इस पुराने फटे झाड़ू की जरूरत नहीं। मेरी दी हुई झाड़ू इस्तेमाल करो। पुराना झाड़ू घर में दिखना नहीं चाहिए।

सास चुपचाप झाड़ू ले लेती है। अगले दिन प्रिया की सहेलियां घर आती हैं। बातचीत के बीच सास फिर वही पुराना झाड़ू लेकर सफाई करती दिख जाती है। यह देखकर प्रिया भड़क उठती है। वह झाड़ू छीनकर बाहर फेंक देती है और सास को अपमानित करती है। कहती है कि अगर यहां रहना है तो मेरे नियमों से रहो।

वरना यहां रहने का कोई हक नहीं।

यह अपमान सहन ना कर पाने पर बूढ़े माता-पिता चुपचाप अपना सामान समेटते हैं और पुराने घर लौट जाते हैं। संध्या को प्रिया मेहमानों के लिए भोजन बनाती है। सब खाते हैं लेकिन उसके लिए अन्न नहीं बचता। जीवन में पहली बार वह भूख ही सोती है।

अगले दिन मजबूरी में वह खुद झाड़ू उठाती है। सफाई के बाद झाड़ू को पैर से धक्का देकर फेंक देती है। कभी उसे उल्टा रख देती है, कभी दरवाजे के बीच छोड़ देती है। कई बार शाम के समय झाड़ू लगाकर कचरा बाहर फेंक देती है। वह नहीं जानती कि यह सब शास्त्रों में अशुभ माना गया है।

अगले कई दिनों तक यही होता है। वह जितना भी भोजन बनाती है, अंत में उसके लिए कुछ नहीं बचता। घर में धन होते हुए भी उसका जीवन खालीपन और दुर्भाग्य से भरने लगता है। वह कमजोर और दुखी होने लगती है। कुछ दिनों बाद हरिदास घर लौटता है। माता-पिता को ना देखकर घबरा जाता है। प्रिया बेरुखी से बताती है कि वह पुराने घर चले गए।

हरिदास सब समझ जाता है लेकिन कुछ नहीं कहता। इसी बीच एक साधु रोज उनके घर के सामने आकर हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगता है। यह रोज का क्रम बन जाता है। धीरे-धीरे घर का सारा धन खत्म हो जाता है। प्रिया बार-बार अपने पिता से धन मंगाती है और अंत में उन्हें भी कंगाल कर देती है।

पिता उससे नाता तोड़ लेते हैं। हरिदास भी माता-पिता के पास चला जाता है। अब प्रिया पूरी तरह अकेली रह जाती है। एक दिन वह साधु से पूछती है कि वह रोज उसके घर को प्रणाम क्यों करता है? साधु कहता है कि वह उसके घर में विराजमान लक्ष्मी को प्रणाम करता है ताकि वे उसके घर ना आए।

यह सुनकर प्रिया टूट जाती है। उसे एहसास होता है कि उसने अपने कर्मों से लक्ष्मी को घर से निकाल दिया है। वह रोते हुए साधु के चरण पकड़ लेती है और उपाय पूछती है। तब साधु अपने वास्तविक रूप में उसे समझाने लगते हैं। साधु ने कहा, हे पुत्री, यह सब तुम्हारे ही कर्मों का फल है।

तुमने झाड़ू का अपमान किया,

उसे पैरों से ठुकराया,उल्टा रखा, गलत समय पर सफाई की और शाम के बाद कचरा बाहर फेंका। शास्त्रों में झाड़ू को माता लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। उसके अनादर से लक्ष्मी रुष्ट होकर चली जाती हैं।

साधु ने बताया कि झाड़ू तीन प्रकार की होती है।

प्लास्टिक की झाड़ू त्याज्य मानी जाती है।

फूल या सजावटी झाड़ू केवल सजावट के लिए होती है।

घर की सफाई के लिए केवल प्राकृतिक सीकों वाली झाड़ू ही शुभ मानी जाती है। झाड़ू खरीदने के लिए शनिवार, मंगलवार और रविवार शुभ होते हैं। अमावस्या, दीपावली और पूर्णिमा पर झाड़ू लाना विशेष फल देता है।

उन्होंने समझाया कि झाड़ू को ईशान कोण में कभी नहीं रखना चाहिए। दक्षिण पश्चिम दिशा सबसे उचित होती है। झाड़ू सुबह सूर्योदय से पहले लगाना अत्यंत शुभ है।

दोपहर सामान्य समय है, लेकिन सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाना

अशुभ माना गया है। रात में कचरा बाहर फेंकना लक्ष्मी को विदा करने जैसा है।बटूटी झाड़ू को शनिवार के दिन ही सम्मान पूर्वक घर से बाहर निकालना चाहिए। झाड़ू को कभी खड़ा नहीं रखना चाहिए, ना ही पैर से छूना चाहिए। झाड़ू से किसी प्राणी को मारना भी बड़ा दोष माना गया है।

प्रिया रोते हुए बोली कि उसे कई दिनों से भोजन नहीं मिल रहा। तब साधु ने कहा कि यह दोष भी तुम्हारा ही है। तुमने अपनी सास को अन्न से वंचित किया। उनका अपमान किया और उन्हें घर से निकाल दिया।

इसी कारण देवी अन्नपूर्णा तुमसे रुष्ट हो गई।

साधु ने बताया कि भोजन बनाने से पहले माता अन्नपूर्णा का स्मरण करना चाहिए। आटा गूंथते समय उनकी छवि बनाकर मंत्र जपना चाहिए। प्रतिदिन एक रोटी या अन्न पशु, पक्षी और जरूरतमंद के लिए निकालना चाहिए।

रसोई की स्वच्छता अत्यंत आवश्यक है। इसके बाद साधु ने कहा कि अब अपने पति और सास, ससुर के चरणों में जाकर क्षमा मांगो। सच्चा पश्चाताप ही सबसे बड़ा प्रायश्चित होता है। प्रिया पुराने घर पहुंची और रोते हुए सबसे क्षमा मांगी। सास का हृदय पिघल गया। हरिदास ने भी उसे स्वीकार कर लिया।

माता लक्ष्मी,ने सभी पुनः साथ लौट आए।

घर लौटकर प्रिया ने सबसे पहले झाड़ू का सम्मान किया। हल्दी कुमकुम लगाया। फिर माता अन्नपूर्णा की विधि से पूजा की और श्रद्धा से भोजन बनाया। उस दिन पहली बार उसने भरपेट भोजन किया।

अब उसका स्वभाव बदल चुका था।

वह विनम्र, संयमी और कर्मठ बन गई। समय पर झाड़ू लगाती, घर स्वच्छ रखती और सभी का सम्मान करती। धीरे-धीरे घर में सुख, शांति और समृद्धि लौट आई। मित्रों इस कथा से हमें यही शिक्षा मिलती है कि गंदगी, घमंड और कटु वाणी लक्ष्मी को दूर करती है। स्वच्छता, विनम्रता और श्रद्धा से घर में लक्ष्मी और अन्नपूर्णा दोनों का वास होता है। माता लक्ष्मी की बात सही है तू कमेंट में जय मां लक्ष्मी अवश्य लिखें धन्यवाद

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