सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला:पिता की संपत्ति में शादीशुदा बेटी के हक को लेकर अक्सर समाज में बहस चलती है। अब इसी चीज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जो बाकी मामलों के लिए नजीर साबित हो सकता है।
एक बेटी ने इंटरकास्ट शादी की और पिता ने उसे जायदाद से बेदखल कर दिया। लड़की को मिलाकर कुल नौ भाई-बहन थे। पिता ने आठ भाई बहनों के नाम संपत्ति की लेकिन उस लड़की को संपत्ति में से कुछ भी नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: ऐसे में अपनी हक की अर्जी लेकर लड़की ने कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: कोर्ट ने भी पिता का ही साथ दिया।

इस मामले को सुनकर शुरुआत में आपको लगेगा कि कोर्ट ऐसा अन्याय कैसे कर सकता है। लेकिन कोर्ट की ओर से जो वजह दी गई उसे सुनने के बाद आप भी कहेंगे कि कोर्ट ने सही किया।
शला जोसेफ नाम की महिला अपने पिता एनएस श्रीधरन की संपत्ति में बराबर के अधिकार की मांग कर रही थी। जबकि श्रीधरन ने समुदाय से बाहर शादी करने के चलते शला को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया। शला के वकील की ओर से दलील दी गई कि बाकी भाई बहनों की ही तरह उनका भी संपत्ति में बराबर का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला:पिता की संपत्ति में हक मिलना ही चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात से इंकार कर दिया। इस मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि वसीयत में दखल नहीं दिया जा सकता। पिता की संपत्ति पर शायला का कोई अधिकार नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा साबित हो चुकी वसीहत में दखल नहीं दिया जा सकता। हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द किया जाता है। यह पाया गया है कि वादी यानी शला का अपने पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है। जो वसीहत के जरिए अन्य भाई-बहनों को दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट की यह बात सुनकर शला के वकील पीबी कृष्णन ने बेंच से कहा कि उनका अधिकार नवे हिस्से पर है। जो कि संपत्तियों का बहुत छोटा हिस्सा है। इस पर बेंच ने कहा कि एक व्यक्ति की संपत्ति के बंटवारे को लेकर इच्छा में समानता के अधिकार का सवाल नहीं है। किसी भी वसीहत के मुताबिक बांटी गई प्रॉपर्टी वसीहत लिखने वाले की इच्छा के अनुसार होती है।
वसीहत में लिखने वाले की इच्छा को ही प्राथमिकता दी जाती है ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह समानता की बात नहीं है। वसीहत लिखने वाले की इच्छा को ही प्राथमिकता दी जाएगी। वसीहत लिखने वाले की आखिरी वसीहत को भटकाया नहीं जा सकता और उसे नाकाम नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने शायला के भाई बहनों की अपील को स्वीकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मुकदमे को खारिज कर दिया जिसमें वह पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सा चाह रही थी। कोर्ट ने कहा वसीहत में लिखी बातों पर सावधानी के नियम लागू नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला:भाई बहनों को वसीहत के जरिए बेदखल किया जाता है।

अदालतों की तरफ से सावधानी का नियम लागू किया जा सकता था। आखिर में अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शला को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा,हम वसीहत लिखने वाले को अपनी जगह पर रखकर नहीं देख सकते। हम वसीहत लिखने वाले की जगह अपने विचार नहीं थोप सकते। उसकी इच्छा उसके खुद के तर्कों से प्रेरित थी।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से पिता की इच्छा को तवज्जो दी गई। आपका इस फैसले पर क्या राय है कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं धन्यवाद