श्री कृष्ण जी बताते हैं -किस पाप के कारण मनुष्य को कुत्ते का जन्म मिलता है|,मनुष्यों को कुत्ते का जन्म क्यों मिलता है किस पाप के …|

नमस्कार मित्रों, श्री कृष्ण जी बताते हैं –प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है और अपने जीवन में जो जैसा कर्म करता है, उसे मृत्यु के बाद उन्हीं कर्मों के अनुसार अवश्य जन्म मिलता है।

हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस धरती पर रहने वाले सभी मनुष्यों को मृत्यु के बाद उसके कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनि में जन्म मिलता है और उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। कुछ धार्मिक ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि जो मनुष्य अपने जीवन में बहुत अधिक पाप करते हैं,उनको एक ऐसी योनि में जन्म मिलता है जिसमें वे अपना दर्द किसी दूसरे से नहीं बता पाते हैं |और ना ही किसी के साथ अपना दुख बांट सकते हैं।

मित्रों, आज हम आपको बताएंगे कि वह कौन से कार्य हैं जो मनुष्य को अपने जीवन में नहीं करनी चाहिए। नहीं तो उसे कुत्ते का जन्म मिलता है और पूरा जीवन इधर-उधर भटकना पड़ता है। भगवान श्री कृष्ण ने इसके बारे में क्या बताया है कि मनुष्य के वह कौन से पाप हैं जिनके कारण प्रत्येक मनुष्य को अगले जन्म में कुत्ते का जन्म मिलता है।

मित्रों, एक समय की बात है जब देवी सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण जी से मिलने के लिए जाती हैं और भगवान श्री कृष्ण जी से कहती हैं, हे प्रभु आज जब मैं आपसे मिलने के लिए आ रही थी तो मैंने देखा कि एक कुत्ता भोजन की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था और वहीं पर एक मनुष्य भोजन कर रहा था।

वह कुत्ता उसके पास जाकर बैठ गया और कुत्ता सोच रहा था कि अभी यह मुझे भी रोटी खिलाएगा। किंतु उस मनुष्य ने अकेले ही
भोजन कर लिया और उस कुत्ते को रोटी के एक टुकड़ा भी नहीं दिया। फिर कुत्ता भूखे पेट ही वहां से चला गया और हे प्रभु इसे देखकर मेरे मन में दो प्रश्न उठ रहे हैं और मैं चाहती हूं कि आप मेरे दोनों प्रश्नों के उत्तर देकर मुझे संतुष्ट करें।


भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले हे देवी तुम्हारे मन में जो भी प्रश्न है मुझे निश्चिंत होकर बताओ। मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर अवश्य ही दूंगा। तब देवी सत्यभामा बोली हे स्वामी मेरा पहला प्रश्न यह है कि किस पाप के कारण मनुष्य को कुत्ते का जन्म मिलता है और वह कौन से कार्य हैं जो मनुष्य को अपने जीवन में कभी नहीं करने चाहिए तो उसे कुत्ते का जन्म मिलता है |


मेरा दूसरा प्रश्न यह है कि कुत्ते को रोटी खिलाने से हमें कौन सा पुण्य मिलता है? भगवान श्री कृष्ण बोले हे देवी मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूं जिसे सुनकर तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर मिल जाएगा किंतु कथा को पूरा मन लगाकर सुनना। मित्रों जो भी इस कथा को ध्यानपूक पूरा सुनता है उसे 100 कुत्तों को रोटी खिलाने का पुण्य मिलता है और साथ ही कमेंट में सच्ची श्रद्धा से जय श्री कृष्ण जय श्री राम लिखें।

श्री कृष्ण जी बताते हैं -चलिए कथा को शुरू करते हैं।

आगे देवी सत्यभामा कहती हैं हे प्रभु आप कथा सुनाइए। मैं कथा को पूरा मन लगाकर सुनूंगी। कथा को सुनाते हुए भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे देवी एक समय की बात है। जब भगवान श्री राम सभा लगाकर अपनी सभा में बैठे हुए थे। तभी उन्हें एक कुत्ते की जोर-जोर से रोने की आवाज सुनाई देती है।

श्री कृष्ण जी बताते हैं –वहीं सभा में मौजूद द्वारपाल से उस कुत्ते को वहां से भगाने के लिए कहते हैं। तो द्वारपाल कुत्ते के पास जाता है और उसे वहां से भगा देता है। अब फिर अगले दिन जब भगवान श्री राम फिर से सभा में बैठे होते हैं। तभी वह कुत्ता फिर से वहीं पर आकर बैठ जाता है |


जैसे ही भगवान श्री राम सभा में कुछ कहना प्रारंभ करते हैं, फिर से वह कुत्ता जोर-जोर से रोने लगता है। किंतु इस बार भी द्वारपाल कुत्ते के पास जाता है और उसे वहां से भगा देता है। फिर तीसरे दिन जब प्रभु श्री राम सभा में बैठे थे तो फिर से वहीं उस स्थान पर कुत्ता आया और उसी स्थान पर बैठकर जोरजोर से रोने लगा।

श्री कृष्ण जी बताते हैं -किस पाप के कारण मनुष्य को कुत्ते का जन्म मिलता है|,भगवान श्री राम ने मन में सोचा कि यह कुत्ता मेरे दरबार में रोज-रोज आकर रोने क्यों लगता है? जबकि इसे तो कोई मारता भी नहीं है। फिर भी यह रोज मेरे ही दरबार में आकर क्यों रोता है? फिर इतना सोचकर भगवान श्री राम ने द्वारपाल से कहा कि हे द्वारपाल उस कुत्ते को मेरे दरबार में लेकर आओ।

तब एक द्वारपाल उस कुत्ते के पास जाता है और उससे कहते हैं हे स्वान तुम रोज यहां पर ही आकर क्यों रोते हो? और अब तुम चलो। प्रभु श्री राम ने तुमको अपने दरबार में बुलाया है। तब कुत्ता बोला हे मुनिवर मैं एक कुत्ता हूं और कुत्तों का मंदिर राजभवन तथा रसोईघर या गौशाला जैसे पवित्र स्थान पर जाना मना है।

श्री कृष्ण जी बताते हैं -किस पाप के कारण मनुष्य को कुत्ते का जन्म मिलता है|,मनुष्यों को कुत्ते का जन्म क्यों मिलता है किस पाप के …|

मुझे अपवित्र माना जाता है। इसीलिए मैं प्रभु श्री राम के दरबार में नहीं जा सकता हूं। तुम स्वयं ही प्रभु श्री राम से जाकर कह दो यदि उन्हें मुझसे मिलना है। तो वे स्वयं यहां पर आ जाए। किंतु मैं वहां पर दरबार में नहीं जा सकता। उन्हें कुत्ते की यह बात सुनकर द्वारपाल प्रभु श्री राम के पास जाता है और कुत्ते द्वारा कही गई सारी बातें उन्हें बताता है।

फिर भगवान श्री राम कुत्ते के पास आते हैं और कहते हैं हे शवान तुम रोज मेरे दरबार में आकर क्यों रोते हो? क्या मेरे द्वारपाल ने आपको मारा है या फिर मुझसे कोई गलती हो गई है? तब वह कुत्ता बोला नहीं प्रभु ना ही आपसे कोई गलती हुई है ना ही आपके द्वारपाल ने मुझे मारा है |

भगवान राम ने कहा तब फिर रोज तुम मेरे दरबार में आकर क्यों रोते हो तब वह कुत्ता बोला प्रभु एक सन्यासी ने मुझे पत्थर से मारा है जिसके कारण मेरा एक पैर टूट गया है और अब मुझसे सही से चला भी नहीं जाता है और मुझे बहुत पीड़ा भी हो रही है। इसीलिए प्रभु मैं आपके दरबार में आकर रोता हूं।

प्रभु मैंने सुना है कि आप सबका न्याय करते हैं। प्रभु मेरा भी न्याय कीजिए और उस सन्यासी को योग्य शिक्षा देकर दंडित दीजिए। तो उस कुत्ते की यह बात सुनकर प्रभु श्री राम बहुत अधिक दुखी हुए और अपने सैनिकों से कहा जाओ और उस सन्यासी को मेरे दरबार में लेकर आओ। मैं उसे अवश्य ही दंड दूंगा।


मित्रों फिर सैनिक जाते हैं। उस सन्यासी को प्रभु श्री राम के दरबार में लेकर आते हैं। फिर प्रभु श्री राम उस सन्यासी से कहते हैं। यह जो कुत्ता बोल रहा है। यह स्वान जो कह रहा है वह सत्य है। तुमने इस कुत्ते को पत्थर से मारा है। जिससे इसके पैर में बहुत अधिक चोट आई है और अब इस कुत्ते को बहुत अधिक पीड़ा हो रही है।


जिसके कारण यह ठीक से चल भी नहीं पा रहा है। इसने क्या अपराध कर दिया था? जो तुमनेइसे इतनी बड़ी सजा दी है कि इसका पैर ही तोड़ दिया है। तो वह सन्यासी बोला प्रभु मैं अपनी झोली लेकर भिक्षा मांगने के लिए रास्ते से जब जा रहा था तभी यह कुत्ता मेरे पास आया और अपनी पूंछ हिलाने लगा।

श्री कृष्ण जी बताते हैं –जब मैंने इसे खाने के लिए कुछ नहीं दिया तो इसने मेरी भिक्षा का अन्न छू लिया था। जिसके कारण मैंने क्रोध में आकर पत्थर उठाकर इसको मार दिया। पत्थर बहुत अधिक बड़ा होने के कारण इसका पैर ही टूट गया। अब सन्यासी की यह बात सुनकर प्रभु श्री राम उस सन्यासी पर बहुत अधिक क्रोधित हुए और उन्होंने सन्यासी से कहा यह कुत्ता एक अज्ञानी जीव है।

इसने अपना पेट भरने के लिए ऐसा किया। इसे इतना ज्ञान नहीं है कि किसी का अन्न नहीं छूना चाहिए। इसीलिए इस कुत्ते ने ऐसा किया किंतु आप तो एक सन्यासी हैं। आपके अंदर तो ज्ञान है कि किसी भी जीव को इस तरह से नहीं मारना चाहिए। फिर भी आपने इस जीव को मारा।

इसीलिए अपराध इस कुत्ते ने नहीं बल्कि अपराध तो आपने किया है। आप इतने बड़े गहरे हुए भी इस कुत्ते को मारा है। इसीलिए अपराधी आपको ही माना जाएगा। फिर प्रभु श्री राम ने उस कुत्ते से कहा यह सन्यासी तुम्हारा अपराधी है। और अब तुम ही बताओ कि इस सन्यासी को क्या सजा दी जाए?

कुत्ते ने कहा प्रभु इस सन्यासी को किसी नगर का राजा बना दीजिए। तब प्रभु श्री राम ने कहा ठीक है। इसे एक नगर का राजा बना दिया जाएगा। और फिर उस सन्यासी को सुंदर वस्त्र पहनाकर एक घोड़े पर बिठा दिया और उस सन्यासी को एक महल में ले गए। उसे वहां के एक नगर का राजा बना दिया गया।

फिर जब वह सन्यासी राजा बन गया तब बहुत अधिक खुश था और मन में सोचने लगा वह कुत्ता सच में बिल्कुल पागल ही था। मैंने उसका पैर तोड़ दिया था और उसने मुझे सजा देने के बजाय मुझे इस नगर का राजा बना दिया। फिर यह बात किसी की समझ में नहीं आ रही थी कि उस कुत्ते ने सन्यासी को सजा देने के बजाय उसे नगर का राजा क्यों बना दिया।

मित्रों अब कुछ लोग इसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए फिर से प्रभु श्री राम के पास गए और प्रभु श्री राम से पूछने लगे कि प्रभु इस कुत्ते ने इस सन्यासी को सजा देने के बजाय महल का राजा क्यों बना दिया? जबकि उस सन्यासी ने तो कुत्ते का पैर तोड़ दिया था। तो इस कुत्ते को तो उस सन्यासी को सजा देनी थी।

लोगों की यह बात सुनकर प्रभु श्री राम ने कहा इस प्रश्न का उत्तर तो आप लोगों को वह कुत्ता ही दे सकता है कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया? तब सभी लोग उस कुत्ते के पास गए और उस कुत्ते से पूछा आप अपने उस सन्यासी के साथ ऐसा क्यों किया है? उसे दंड देने के बजाय उसे एक नगर का राजा बना दिया।

जबकि उसने तो तुम्हारा एक पैर तोड़ा था। तो कुत्ता मुस्कुराते हुए बोला। तुम जानना चाहते हो कि मैंने उस सन्यासी को सजा देने के बजाय उसे एक नगर का राजा क्यों बना दिया? तो सुनो, मैं भी पिछले जन्म में एक नगर का राजा था और मैं गरीबों पर खूब अत्याचार करता था। मेरे नगर में जितने भी लोग थे,

श्री कृष्ण जी बताते हैं -सभी बहुत अधिक गरीब थे और वह दिन भर खेतों में मेहनत मजदूरी करके जो अन्न के लिए फसलें उगाते थे, उसमें से आधा मैं ले लेता था। और जो भी मुझे अपने फसल से मिलने वाले अन्न में से आधा हिस्सा नहीं देता था। उसे मेरे सैनिक बहुत मारते पीटते थे और उनकी मेहनत का धन मैं हड़प लेता था।

पिछले जन्म में मैंने बहुत सारे पाप किए थे। इसी कारण इस जन्म में मुझे कुत्ते का जन्म मिला है और अब मैं पिछले जन्म में किए गए पापों का फल भोग रहा हूं। मैंने उस सन्यासी को राजा इसीलिए बनाया है ताकि उसे भी अगले जन्म में कुत्ते का ही जन्म मिले और तब उसे पता चलेगा कि कुत्ते का जीवन कैसा होता है |


अपना पेट पालने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है और एक-एक अन्न के लिए कितना तरसना पड़ता है। साथ ही कितने लोगों से
मार खानी पड़ती है। फिर इस तरह उस कुत्ते की यह बात सुनकर सभी की समझ में आ गया था कि उस कुत्ते ने उस सन्यासी को राजा क्यों बनाया है।

मित्रों फिर कथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान श्री कृष्ण देवी सत्यभामा से कहते हैं हे देवी अब मैं तुम्हारे दोनों प्रश्नों के उत्तर देता हूं। तुम्हारा पहला प्रश्न था कि वह कौन से कार्य हैं जो एक मनुष्य को अपने जीवन में नहीं करने चाहिए? नहीं। तो उसे कुत्ते का जन्म मिलता है।

श्री कृष्ण जी बताते हैं –समझ लो जो मनुष्य उस राजा की तरह अपने जीवन में बहुत अधिक पाप करते हैं उन्हें कुत्ते का जन्म मिलता है। और तुम्हारा दूसरा प्रश्न था कि कुत्ते को रोटी खिलाने से हमें कौन सा पुण्य मिलताहै? तो समझ लो जो मनुष्य कुत्ते को भोजन कराता है उसे अपने जीवन में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है तथा उसके जीवन में अनजाने में किए गए पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को कुत्ते तथा भिखारी को रोटी खिलानी चाहिए। फिर देवी सत्यभामा कहती हैं, प्रभु पृथ्वी लोक पर कुछ मनुष्य ऐसे भी हैं जो द्वार पर आए कुत्ते को मारकर भगा देते हैं और कभी भी कुत्ते तथा गाय को रोटी नहीं खिलाते हैं। परंतु वह लोग पूजा पाठ बहुत अधिक करते हैं। तो क्या प्रभु ऐसे लोगों की पूजा ईश्वर स्वीकार करते हैं?

भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले यह वही लोग हैं जो गंगा जी में पाप धुलने के लिए जाते हैं और वहां से आते ही फिर से पाप करना शुरू कर देते हैं। देवी सत्यभामा कहती हैं प्रभु तो क्या गंगा जी में स्नान करने से पाप नहीं धुलती हैं? तब भगवान श्री कृष्ण बोले जानबूझकर किए गए पाप गंगा जी में नहीं धुलती हैं |


गंगा जी में स्नान करने से वही मनुष्य पवित्र होता है जिसका मन साफ हो और मन में कोई छल ना हो तथा मन में गंदे विचार ना होऔर गंगा जी में छल कपट करने वाले और दूसरों की बहन बेटियों पर बु री नजर रखनेवाले लोगों का कुछ नहीं होता है। अंत में ऐसे लोगों का सर्वनाश ही होता है और प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य ही मिलता है। तो मित्रों आपको यह कथा कैसी लगी? हमें कमेंट करके जरूर बताएं। एक बार प्रेम से बोलो जय श्री राम धन्यवाद

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