पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।पत्नी अगर पति की बात ना माने तो क्या करें?

नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है। दोस्तों पुरुष को वह कौन सा अंग है जो विवाह के बाद प्रत्येक स्त्री को ध्यान से देखना चाहिए?


दोस्तों विवाह के बाद पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है । और अनेक स्त्रियां कई बार मायके जाती हैं। और उन्हें मायके में कब तक रुकना चाहिए? और कितने दिन मायके में रहना चाहिए? और पति से दूर अपने पिता के घर में रहकर स्त्री कौन सा पाप करती है? वहां रहने पर उसे कौन सा पाप लगता है? और उस पाप का फल उसके मां-बाप को भी क्यों भोगना पड़ता है?

विष्णु पुराण के अनुसार पति से दूर पिता के घर में रहने वाली स्त्री एक बहुत ही भयंकर पाप कर बैठती है।

जिसका दंड उसके माता-पिता, पुत्र और सारे संसार को भोगना पड़ता है।

दोस्तों, इस विषय में विष्णु पुराणों में एक प्राचीन कथा का वर्णन मिलता है। आज हम आपको वही कथा सुनाने जा रह्म हू। इस कथा की हर के घटना में बहुत ज्ञान छिपा हुआ है। इसीलिए इसे आप उत्सुकता से ग्रहण करें। तो चलिए सुनाते हैं आपको वह कथा।

दोस्तों, एक बार की बात है देवर्षि नारद जी यमलोक की यात्रा पर निकले। वे धर्मराज यमराज से मिलने जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने
यमलोक जाने वाले रास्ते के किनारे स्थित कई नरक देखे। इन नरकों में नारद जी ने अनेक स्त्रियों को भयंकर यातनाएं भोगते हुए देखा। उन स्त्रियों का एक-एक अंग आग में जल रहा था और वे दर्द से चीख रही थी।


उनके करुण क्रंदन से समस्त मार्ग गूंज उठा। नारद जी ने हैरानी से सुना कि वे स्त्रियां विलाप कर रही थी। हाय हमने मायके में रहकर घोर पाप किया है। अब हमें इस पाप से मुक्ति कैसे मिलेगी? उनकी यह बात सुनकर देवर्षि नारद के मन में गहरी शंका उत्पन्न हुई। वे सोचने लगे यह बेचारी स्त्रियां कौन सा पाप की बात कर रही हैं? क्या मायके में रहना पाप हो सकता है? और यदि ऐसा है तो इस पाप का फल कौन भोगता है?


इस रहस्य को जानने के लिए नारद जी पति को वश में करने वाली स्त्री को भोगना पडता है ये जन्म ने तुरंत यमराज के दरबार की ओर प्रस्थान किया। यमपुरी पहुंचकर नारद जी यमराज केपति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है । समक्ष उपस्थित हुए। धर्मराज यमराज ने आदर पूर्वक उनका स्वागत किया और बोले, हे देवर्षि नारद, यमलोक में आपका स्वागत है। आज आपके आगमन का क्या कारण है? निश्चय ही आप कोई महत्वपूर्ण समाचार लेकर आए होंगे। नारद जी ने यमराज को प्रणाम कर कहा, हे धर्मराज, मैं आपके दर्शन करने की इच्छा से ही यहां आया था।

परंतु मार्ग में मैंने एक अति विचित्र दृश्य देखा जिसने मेरे मन में कई प्रश्न उठा दिए हैं। यदि आप अनुमति दें तो मैं अपनी शंका आपके सम्मुख रखूं। यमराज ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया हे देवर्षि निह संकोच अपने हृदय की शंका मुझसे पूछिए। मैं आपकी जिज्ञासा अवश्य दूर करने का प्रयत्न करूंगा। तब देवर्षि नारद ने निवेदन किया हे धर्मराज यमपुरी को आते समय मार्ग में मैंने नारकीय यातना भोग रही कई स्त्रियों को देखा वे जोर-जोर से रोकर कह रही थी।

पिता के घर में रहकर घोर पाप किया है। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि विवाह के बाद पिता के घर में रहने से ऐसा कौन सा पाप हो जाता है। कृपा करके बताएं कि एक स्त्री मायके में रहकर कौन सा पाप करती है और उस पाप का दंड आखिर किसे भुगतना पड़ता है। यमराज ने नारद जी की बात ध्यान से सुनी और कहा हे देवर्षि आपने बहुत उचित प्रश्न पूछा है।

इस प्रश्न का उत्तर समस्त मानव जाति के कल्याण से जुड़ा है। पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।प्रत्यक्ष उत्तर देने से पहले मैं आपको महाराज कंस के जन्म की एक कथा सुनाता हूं। इस कथा को सुनने के बाद आपकी शंका भी दूर हो जाएगी और समस्त मनुष्य जाति को एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलेगी। यमराज आगे बोले ध्यान से इस कथा को सुनिए। जो भी मनुष्य श्रद्धा पूर्वक इस कथा का श्रवण करता है।


32 प्रकार के पाप मैं क्षमा कर देता हूं। देवर्षि नारद उत्सुक होकर बोले हे धर्मराजऐसी पुण्यमय कथा अवश्य सुनाइए। मैं पूरे मन से इसे सुनूंगा और बाद में संसार में इसका प्रसार भी करूंगा। नारद जी के उत्साह को देख यमराज ने कथाप्रारंभ की। उन्होंने कहना शुरू किया हे देवर्षि यह घटना भविष्य में 28वें द्वापरयुग में घटने वाली है।

अब मैं इसका वर्णन ऐसे करूंगा मानो भूतकाल की कथा सुना रहा हूं।ध्यान से सुनिए।

मथुरा नाम की एक नगरी में यदुवंश के प्रतापी राजा उग्रसेन राज्य करते थे। उग्रसेन धर्म परायण और न्यायप्रिय शासक थे। उसी समय विदर्भ देश में एक बहुत ही सुंदर राजकन्या भी निवास करती थी जिसका नाम पद्मावती था। वह विदर्भ नरेश महाराज सत्यकेतु की पुत्री थी। महाराज सत्यकेतु ने अपनी पुत्री पद्मावती का विवाह महाराज उग्रसेन से तय कर दिया।


विधिविधान पूर्वक पद्मावती और उग्रसेन का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात रानी पद्मावती अपने पति की सेवा में पूर्णतया लग गई। अपने स्नेह और समर्पण से उन्होंने शीघ्र ही महाराज उग्रसेन का हृदय जीत लिया। महाराज उग्रसेन रानी पद्मावती से अत्यंत प्रेम करने लगे। यहां तक कि वे पद्मावती के बिना एक पल भी नहीं रह पाते थे।

रानी के दर्शन किए बिना ना तो उन्हें भोजन में रुचि होती ना राज्य कार्य में मन लगता। वह अधिकांश समय रानी के साथ क्रीडा विलास और मधुर वार्तालाप में व्यतीत करने लगे। उधर पद्मावती भी अपने पति पर प्राण न्योछावर करती थी। दोनों का प्रेम दिन
प्रतिदिन गहरा होता गया। कुछ वर्षों बाद रानी पद्मावती के माता-पिता को अपनी बेटी की याद सताने लगी।

विदर्भ नरेश, सत्यकेतु और रानी की मां अपनी पुत्री के दर्शनों को उत्सुक रहने लगे। अंततः महाराज सत्यकेतु ने मथुरा में अपने दूत के हाथ संदेश भिजवाया। दूत ने महाराज उग्रसेन को आदर पूर्वक प्रणाम कर संदेश सुनाया। हे महाराज उग्रसेन विदर्भ नरेश महाराज सत्यकेतु अपने जमाई राजा को सादर प्रणाम कहते हैं।


आपका कुशलक्षेम जानना चाहते हैं और आग्रहकरते हैं कि यदि आपको आपत्ति ना हो तो रानी पद्मावती को कुछ समय के लिए मायकेभेज दें। महाराज सत्यकेतु और रानी पद्मावती की माता अपनी पुत्री को देखने के लिए आकुल हैं। उग्रसेन ने दूत का संदेश सुनकर सहमति में सिर हिलाया। उन्होंने ससुर महाराज सत्यकेतु की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी प्रिय पत्नी को कुछ दिनों
के लिए पिता के घर जाने की अनुमति दे दी।

पत्नी से कुछ समय दूर रहने का निर्णय महाराज के लिए कठिन था। किंतु ससुर के आदर में उन्होंने त्याग करना उचित समझा। पति की अनुमति पाकर रानी पद्मावती अत्यंत प्रसन्न हुई। उन्होंने महाराज उग्रसेन से विदा ली और राजकीय रथ में सवार होकर विदर्भ अपने पिता के नगर चली गई। अपनेमायके पहुंचकर पद्मावती ने प्रेम पूर्वक माता-पिता के चरण स्पर्श किए।

अचानक बेटीको अपने समक्ष देखकर महाराज सत्यकेतु और उनकी रानी की खुशी का ठिकाना ना रहा। दोनों ने हर्ष पूर्वक बेटी को गले लगाया और आशीर्वाद दिया। यमराज बोले इस प्रकार राजकुमारी पद्मावती विवाह के बाद पहली बार कुछ समय के लिए मायके में रहने लगी। मायके के वातावरण में पद्मावती फिर से बचपन की स्मृतियों में खो गई।

वहां अपनी सखियों से मिलकर वह इतनी आनंदित हुई कि मानो फिर छोटी बालिका बन गई हो। अब उनके व्यवहार में विवाह के बाद का संकोच भी कम हो गया था। माता-पिता के घर वे मुक्त भाव से विहार करने लगी। अपने बचपन के मित्रों के साथ कभी उपवनों में घूमती तो कभी नदी तट और सरोवरों के किनारे मस्ती करती।

मायके का स्नेह और स्वतंत्रता पाकर वे कुछ समय के लिए अपने पति धर्म के चिंतन से भी निश्चिंत हो गई थी। इस वृतांत को सुनाते
हुए यमराज गंभीर हो गए। उन्होंने आगे कहा एक दिन पद्मावती अपनी सखियों के साथ पास के एक सुंदर पर्वत की सैर पर गई। उस पर्वत की तराई में हरा भरा रमणीय वन फैला हुआ था जिसमें तरह-तरह के सुगंधित फूलों से भरे वृक्ष लहलहा रहे थे।

उसी वन के बीचोंबीच मीठे स्वच्छ जल से भरा हुआ एक सुंदर सरोवर था जिसे सर्वतोभद्र कहा जाता था। उस स्वच्छ सरोवर को देख पद्मावती ने सखियों से कहा कि वे सब उसमें स्नान करेंगी और जल क्रीड़ा का आनंद लेंगी। सारी सखियां हंसतेगाते सरोवर के निर्मल जल में उतर गई। राजकुमारी पद्मावती भी अपनी सखियों के साथ अटखेलियां करते हुए डुबकियां लगाने लगी।

उस पल पद्मावती अपने पति को बिल्कुल भूलगई थी। बाल्यकाल की सहेलियों संग जल में खेलते कूदते समय उनके मन में एक बार भीपति उग्रसेन का ध्यान नहीं आया। वेनिश्चिंत होकर मौज मस्ती में मग्न थी। उसी समय आकाश मार्ग से कुबेर का एक अनुचर गोभी नामक एक दैत्य अपने दिव्य विमान पर कहीं जा रहा था।

वह संयोगवश उसी सरोवर के ऊपर से गुजरा जहां पद्मावती अपनी सखियों संग क्रीड़ा कर रही थी। नीचे दृष्टि पड़ते हीगोभी की निगाह उस रूपवती पद्मावती पर ठिठक गई। पद्मावती का अप्रतिम सौंदर्य और बड़ी-बड़ी कमल जैसी आंखें देख वह मोहित होउठा। उसने तुरंत अपने दिव्य ज्ञान से जानलिया कि यह सुंदरी विदर्भ नरेश सत्यकेतु की पुत्री पद्मावती है

मथुरा नरेशउग्रसेन की पत्नी है। पद्मावती को देख गोभी के मन में तीव्र वासना जाग उठी। वह मन ही मन सोचने लगा। अहो कैसी अ नुपम सुंदरी है। इसका रूप तो देवताओं को भी दुर्लभ है। लेकिन यह पतिव्रता है। अपनेआत्मबल से सुरक्षित है। ऐसी सती स्त्री को छल से ही पाया जा सकता है। सीधे इससे कुछभी करना असंभव है। महाराज उग्रसेन भीकितने मूर्ख हैं

जो इन्होंने अपनी रत्न समान पत्नी को मायके भेज दिया। अब कामदेव मेरी बुद्धि हर रहे हैं। मैं इस सुंदरी कोप्राप्त करने के लिए क्या उपाय करूं? यह सोचकर उस दैत्य ने एक योजना बनाई। उसने अपने मायावी कौशल से तत्काल महाराजउग्रसेन का रूप धारणकर लिया। अब उसका रूपरंग, वेशभूषा सब कुछ उग्रसेन के समान दिखने लगा।

दूर से देखने पर कोई भी अंतर नहीं कर सकता था। रूप बदलकर गोभी उस वन में एक घने वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गया। फिर उसने बड़े ही मधुर स्वर में वीणा बजाना शुरू किया। उस संगीत की धुन जादुई थी। जिसमें मन मोह लेने की शक्ति थी। सरोवर में जल क्रीड़ा करती पद्मावती और उनकी सखियों के कानों में जब वह मधुर तान पड़ी तो वे मुग्ध हो उठी।

संगीत की तरफ बरबस सबका मन आकर्षित होने लगा। पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।पद्मावती आश्चर्य से सोचने लगी। यह मंत्रमुग्ध करने वाला संगीत कौन बजा रहा है? राजकुमारी पद्मावती ने सखियों के साथ उस दिशा में कदम बढ़ाए जिधर से स्वर आ रहा था। कुछ ही दूर जाने पर उन्होंने देखा कि एक घने पेड़ के नीचे एक पुरुष बैठा वीणाबजा रहा है।

निकट जाकर देखा तो पद्मावती चौंक पड़ी। वह पुरुष हूबहू महाराज उग्रसेनकी तरह दिखाई दे रहा था। पहले तो पद्मावती को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। वे सोचने लगी मेरे धर्म परायण स्वामी अपना राज्य प्रसाद छोड़कर इतनी दूर इस वन में कैसे आ गए? उनके मन में आश्चर्य और प्रसन्नता का मिलाजुला भाव जागा। तभी पेड़ के नीचे बैठे उस व्यक्ति ने स्वयं ही मधुर स्वर में पुकारा।


प्रिय पद्मावती इधर आओ। मैं तुम्हारे बिना बिल्कुल नहीं रह पा रहा था। इसीलिए तुम्हें लेने स्वयं चला आया हूं। मेरे प्रिय तुम्हें देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता था। मैं एक क्षण को भी तुमसे दूर नहीं रह सकता। महाराज उग्रसेन को वहां बैठा देखकर पद्मावती सोचने लगी। मेरे धर्म परायण पति अपना राज्य छोड़कर इतनी दूर कब और कैसे चले आए?

वह मन ही मन कुछ संकोच में पड़ गई। परंतु अपने पति को यूं अपने पास पाकर उनके मन में हर्ष भी हो रहा था। अपने पति के ऐसे प्रेमपूर्ण वचन सुनकर रानी पद्मावती लज्जा से भर गई। उन्हें विश्वास हो गया कि यह स्वयं महाराज उग्रसेन ही हैं जो प्रेमवश उन्हें लेने वन में आए हैं। पति का यह अथाह प्रेम देखकर रानी पद्मावती मन ही मन धन्य हो गई।

वह शर्माती हुई धीरे-धीरे उनके निकट चली गई। मौका पाकर उस बहरूपिए ने रानी पद्मावती का कोमल हाथ पकड़ लिया। पद्मावती कुछ समझ पाती। इसके पहले ही वह उन्हें लेकर वन के और भीतर एक एकांत स्थान पर चला गया। जहां दूर-दूर तक कोई नहीं था। घने वृक्षों की ओठ में पहुंचते ही उस धूर्त ने रानी को बाम्हों में भर लिया।


पद्मावती को अब तक पूरा विश्वास था कि यह उनके अपने पति हैं। पति प्रेम पर न्योछावर रानी ने लज्जा त्याग कर स्वयं को उनके आलिंगन में छोड़ दिया। उस छिए ने इस तरह एकांत में अपनी इच्छा के अनुसार रानी पद्मावती के साथ भोग विलास किया। उसने
रानी के साथ वैवाहिक अधिकार की तरह सहवास किया और अपनी काम प्यास बुझाई।

उस कुकर्मी राक्षस की वासना शांत होते ही रानी पद्मावती को कुछ असामान्य लगा। महाराज उग्रसेन के शरीर पर एक गोपनीय चिन्ह था जिसे रानी भली-भांति जानती थी। किंतु इस व्यक्ति के शरीर पर वह चिन्ह कहीं नहीं था। यह देखते ही पद्मावती सन्न रह गई। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।जिसे वे अब तक अपना पति समझ रही थी। वह वास्तव में कोई भयंकर धोखेबाज निकला। रानी का हृदय जो अभी प्रेम और सुख से भरा था। अगले ही पल भय और क्रोध से भर गया। वे तत्क्षण उस व्यक्ति की बाहों से छिटक कर अलग हो गई और हड़बड़ा कर अपने वस्त्र ठीक करते हुए खड़ी हो गई।

पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। क्रोध और अपमान से कांपती हुई रानी पद्मावती चिल्लाई। अरे दुष्ट तू है कौन? सच-सच बता। तुझ नीच ने महाराज उग्रसेन का रूप धरकर मेरे साथ यह घोर छल क्यों किया? तूने एक पतिव्रता नारी की पवित्रता नष्ट करके महापाप किया है। तू महापापी है, अत्याचारी है।

अब एक क्षण भी विलंब किए बिना मैं तुझे अपने श्राप से भस्म कर दूंगी। यह सुनते ही वह दुष्ट गोभील अपना असली राक्षसी रूप प्रकट करते हुए अट्टाहास करने लगा। उसने व्यंग पूर्ण स्वर में कहा हे अभिमानी नारी मुझे श्राप देने से पहले अपने दोष पर भी एक नजर डाल लो। मैं जन्म से और कर्म से राक्षस हूं। छल कपट और दुष्टता मेरा स्वभाव है।

मैंने तो अपने स्वभाव वश वही किया जो एक राक्षस करता। तुम मुझे किस अपराध के लिए श्राप देना चाहती हो? यदि मैंने राक्षस होकर अधर्म किया है तो तुमने पतिव्रता स्त्री होकर कौन सा धर्म निभाया है? रानी पद्मावती ने आंसू पोंछकर कठोर स्वर में उत्तर दिया हे पापी राक्षस मैं एक साध्वी पतिव्रता नारी हूं।

मेरे मन वचन और शरीर तीनों में केवल मेरे पति का वास है। मैं उन्हीं की कामना करती हूं। उन्हीं के लिए व्रत तप करती हूं। मैं अपने धर्म पथ पर अडिग थी। किंतु तूने मायाजाल रचकर मेरे साथ अनर्थ किया है। तूने मेरा पवित्र तन मलिन कर दिया। मेरा पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया।

जान ले पतिव्रता स्त्री का सतीत्व भंग करने वाले पापी को घोर नरक में स्थान मिलता है। मरने के बाद तू जैसे सूअर की योनि में जन्म लेगा। पद्मावती क्रोध व शोक से कांप रही थी। उन्होंने आगे कहा देवका भी पतिव्रता नारी से भय खाते हैं। पतिव्रता के श्राप से सूर्य का तेज ठंडा पड़ सकता है।

सरोवर सूख सकते हैं और वृक्ष फलहीन हो सकते हैं। संसार का अस्तित्व पतिव्रता स्त्रियों के तप से चलता है और तूने ऐसी एक पवित्र स्त्री का अपमान करने की घोर धृष्टता की है। मैंने अपने पति का कभी अपमान नहीं किया। सदा उनकी सेवा की है। उनकी आज्ञा का पालन किया है। फिर भी तूने मेरा सतीत्व भंग करने का साहस कैसे किया?

पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।तुझे मेरे श्राप से कोई नहीं बचा सकेगा। पद्मावती का तमतमाया चेहरा देखकर भी उस राक्षस पर कोई असर नहीं हुआ। वह क्रूरता से हंसकर बोला। सुंदरी अब मेरी बात भी सुनती जाओ। जैसे अंधे मनुष्य को कुछ दिखाई नहीं देता। वैसे ही इस समय तुम धर्म रूपी नेत्रों से अंधी हो गई थी।

पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।पत्नी अगर पति की बात ना माने तो क्या करें?

जिस क्षण तुमने अपने पति का घर छोड़ मायके आने की इच्छा की उसी क्षण तुम्हारे मन से पति ध्यान लुप्त हो गया। सच्ची पतिव्रता स्त्री तो हर पल केवल अपने पति का ही स्मरण करती है। जब तुम्हारे हृदय में पति से दूर होने का विचार आया तभी तुम्हारे पतिव्रता धर्म की आंखें फूट गई।

बस तभी तुम मुझे पहचान ना सकी। यदि तुम सच्ची पतिव्रता होती तो रूप बदलने के बावजूद मुझे देखते ही जान लेती कि मैं तुम्हारा स्वामी नहीं हूं। पतिव्रता नारी सुगंध से भी अपने पति को पहचान लेती है। किंतु तुम तो मायके आकर अपने पति को सर्वथा भूल ही गई थी। इसीलिए मुझ छलिय को तुम अपना पति समझ बैठी और मेरे पीछे वन में चली आई।

राक्षस गोभी के यह निष्ठुर वचन सुनकर रानीपति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है । पद्मावती को अपनी भूल का भान हुआ। उनका क्रोध अब पश्चाताप में बदलने लगा। वह भीतर ही भीतर खुद को कोसने लगी कि सचमुच उन्होंने अपने पति से दूर रहकर भारी भूल की है। तभी गोभी ने अंतिम बात कही। हे पद्मावती मैं तुझे भोग कर चला हूं।

अब इसके परिणाम स्वरूप तुम्हारे गर्भ से एक ऐसा पुत्र जन्म लेगा जो तीनों लोकों के प्राणियों को दुहक पहुंचाएगा। यही तुम्हारे इस पाप का फल होगा। गोभी यह कहकर वहां से अंतर्ध्य हो गया। वह आकाश में विलीन होकर अपने लोक को लौट गया। पीछे रह गई बेचारी पद्मावती जो इस आघात से मानो अधमरी हो चुकी थी।

जंगल की उस निर्जनता में वह एक वृक्ष का सहारा लेकर फूट-फूट कर रोने लगी। कुछ देर बाद पद्मावती के विलाप की आवाज सुनकर उनकी सखियां घबरा गई और उन्हें खोजते हुए उस ओर दौड़ी। सखियों ने पद्मावती को रोते-बिलखते पाया तो हक्की बक्की रह गई। उन्होंने आश्चर्य और चिंता से पूछा, राजकुमारी क्या हुआ? आप रो क्यों रही हैं?

महाराज उग्रसेन कहां गए? रानी पद्मावती ने रोते हुए अपने दोहक की कथा सखियों को सुना दी। सखीजन यह जानकर बेहद स्तब्ध हुई कि रानी पद्मावती जैसी पतिव्रता नारी के साथ ऐसी विपत्ति घट गई। उन्होंने तुरंत पद्मावती को ढाढ़स बंधाया और वहां से ले जाकर महल पहुंचा दिया।


मायके लौटकर रानी पद्मावती भय और शोक से थरथर कांप रही थी। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। सखियों ने तत्काल पद्मावती की माता रानी को बुलाकर सब हाल सुना दिया। अपनी पुत्री पर घोर विपत्ति आ गई थी। यह जानकर महारानी पद्मावती की माता तो मूर्छित होकर गिर पड़ी।

शोर सुनकर स्वयं महाराज सत्यकेतु वहां आए। पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।उन्होंने व्याकुल होकर अपनी बेहोश पत्नी को संभाला और जब पुत्री की आपबीति सुनी तो राजा सत्यकेतु की आंखों में भी आंसू भर आए। दुख, क्रोध और पश्चाताप से भरे सत्यकेतु फूट पड़े। हाय यह मैंने क्या किया? मैंने ही अपनी फूल सी बच्ची को मायके बुलाकर अनजाने में अनर्थ करा दिया।

काश मैंने पद्मावती को बुलाया ही ना होता। तो वह आज ऐसे पाप की भागी ना बनती। समय रहते कुछ नहीं किया जा सकता था। महाराज सत्यकेतु ने तुरंत निर्णय लिया कि पद्मावती को बिना विलंब पति के पास लौटा दिया जाए। उन्होंने विश्वस्त सेवकों के साथ आदर पूर्वक पद्मावती को मथुरा वापस भेज दिया। माता-पिता ने दुखी हृदय से बेटी को विदा किया।

उनके मन में असीम ग्लानि थी कि उनकी लाडली के साथ उनके घर में ऐसा अनर्थ हो गया। उधर मथुरा में महाराज उग्रसेन अपनी प्राणप्रिय पत्नी से बिछड़कर बेचैन थे। उन्हें दिन में चैन था ना रात को नींद आती थी। पद्मावती के बिना वे स्वयं को आधा अधूरा महसूस कर रहे थे।


प्रेम में डूबी ऐसी अवस्था में जब अचानक महारानी पद्मावती को समय से पहले वापस आते देखा तो महाराज उग्रसेन के हर्ष का
पारावार ना रहा। उन्होंने दौड़कर प्रेम पूर्वक पद्मावती को गले लगा लिया और कहा हे प्रिय तुम्हारे बिना मेरा जीवन एक क्षण को भी सुखद नहीं था।

यदि तुम कुछ दिन और नहीं आती तो शायद मेरे प्राण ही निकल जाते। पति के मुंह से यह प्रेमपूर्ण वचन सुनते ही अपने अंतर में छिपाए भारी दुहक के बोझ तले दबी रानी पद्मावती फूट-फूट कर रो पड़ी। वह रोते हुए महाराज के सीने से लग गई। उग्रसेन घबरा गए। उन्होंने प्यार से रानी के आंसू पोंछते हुए पूछा। सुंदरी क्या हुआ?

तुम्हारी आंखों में आंसू क्यों है? क्या विदर्भ में माता-पिता से विदा लेते समय मन व्याकुल हो गया है? मुझे बताओ कि तुम्हारे हृदय में ऐसा कौन सा दुख है जो तुम मुझसे छुपा रही हो? रानी पद्मावती ने अपने आप को संभाला और चेहरे पर सामान्य भाव लाते हुए बोली। स्वामी कुछ नहीं। मायके से विदा लेते समय मन भारी हो गया था।

इसलिए माता-पिता को छोड़ने के दुख में रो पड़ी। आप चिंता ना करें। अब मैं आ गई हूं ना। यह कहकर उन्होंने बात को टाल दिया और उस महापाप का जिक्र अपने पति से छुपा गई। रानी पद्मावती ने निश्चय किया कि इस कलंक को जीवन भर अपने हृदय में छिपाए रखेंगी।

इसके बाद पद्मावती ने स्वयं को संयत कर लिया और पहले की तरह महाराज की सेवा व प्रेम में लग गई। पर भीतर से उनका हृदय हर समय ग्लानी और भय से कांपता रहता था। उनके मन में पल-पल गोभी के कहे शब्द गूंजते रहते थे। उन्हें चिंता सताने लगी थी कि उनके गर्भ में बोए गए उस पाप के बीज का परिणाम क्या होगा।

समय बीतने लगा। कुछ महीनों बाद पद्मावती के गर्भ के लक्षण प्रकट होने लगे। महाराज उग्रसेन को यह ज्ञात हुआ तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए कि उनके यहां उत्तराधिकारी जन्म लेने वाला है। परंतु रानी पद्मावती के मन में आनंद के स्थान पर अज्ञात भय समाया हुआ था। केवल वही जानती थी कि उनके गर्भ में पल रहा शिशु वास्तव में किसका अंश है।

इस गहरे रहस्य को उन्होंने किसी से साझा नहीं किया। दिन महीने वर्ष बीतते गए और वह गर्भ असामान्य रूप से बढ़ता ही गया। पूरा 10 वर्ष बीत गए किंतु पद्मावती ने संतान को जन्म नहीं दिया। उग्रसेन सहित सभी यह सोचकर हैरान और चिंतित थे कि आखिर यह गर्भ इतना लंबा क्यों खींच रहा है।

10वें वर्ष के अंत में पद्मावती ने एक बालक को जन्म दिया। लेकिन उस बच्चे के जन्म लेते ही महल में हाहाकार मच गया। वह कोई साधारण बालक नहीं था बल्कि देखने में ही अत्यंत भयंकर प्रतीत होता था। जन्मते ही उसके मुख से अट्टाहास जैसी ऊंची चीख निकल पड़ी और उसके नेत्र अंगारे जैसे लाल चमकने लगे।

ज्योतिषियों ने उसकी कुंडली देखकर कांपते हुए भविष्यवाणी की कि यह बालक बड़ा होकर अत्यंत अधर्मी और क्रूर शासक बनेगा। यह सुनकर महाराज उग्रसेन और रानी पद्मावती सन्न रह गए। उन्हें समझते देर ना लगी कि यह अलौकिक बालक सामान्य मानव संतान नहीं है। यह बालक और कोई नहीं।

भविष्य में तीनों लोकों को आतंकित करने वाला कंस था। यमराज ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “हे देवर्षि नारद, भविष्य में घटने वाली इस घटना का विवरण मैंने आपको भूतकाल की भांति सुना दिया। यही महाराज कंस के जन्म की कथा है।” यमराज ने फिर नारद जी को संबोधित करते हुए आगे कहा।

पति से दूर रहने वाली स्त्री कौन से पाप करती है ।पत्नी अगर पति की बात ना माने तो क्या करें?

अब आपके प्रश्न का उत्तर ध्यान से सुनिए। जो विवाहिता स्त्री शादी के बाद भी पिता के घर में रहती है, वह अनजाने में अपने पति धर्म से विमुख होकर पाप कर सकती है। मायके में रहकर उससे जो पाप होता है, उसका फल अंततः उसके माता-पिता को ही भोगना पड़ता है। इसलिए विवाह के बाद किसी पिता को अपनी पुत्री को लंबे समय तक मायके में नहीं रखना चाहिए।

धर्मराज यमराज बोले स्त्री का विवाह जिस पुरुष के साथ हुआ है उसी के घर में रहना उसका परम कर्तव्य है। ससुराल में रहकर जब वह भक्ति भाव से अपने पति की सेवा करती है तो उससे पति और पिता दोनों कुलों की कीर्ति बढ़ती है। पर मायके आकर स्त्री फिर से अपने बचपन के सुख में मग्न होकर पति को भूल सकती है और उसके धर्म से डिगने का भय रहता है।

विवाह के उपरांत उसकी वास्तविक रक्षा उसका पति ही कर सकता है। पति से दूर रहने पर कभी भी उसके मन में विकार पैदा हो सकता है या वह मोहवश किसी पर पुरुष के जाल में फंस सकती है। अतः उचित यही है कि विवाहिता स्त्री को उसके पति से दूर ना रखा जाए। यमराज ने स्पष्ट कहा यदि स्त्री ससुराल में रहकर कोई पाप करती है

उसका फल उसके पति को भोगना पड़ता है। लेकिन यदि वह मायके में रहकर पाप की भागी बनती है तो उस पाप का दंड उसके माता-पिता को भुगतना पड़ता है। पुत्री के सद्गुणों से ही पिता की कीर्ति बढ़ती है। इसलिए बेटी का स्थान विवाह के पश्चात उसके पति के घर पर ही होता है।


यहां तक कि दामाद के साथ भी अपनी बेटी को मायके में लंबे समय तक ठहरने नहीं देना चाहिए। विवाहिता नारी का परम धर्म यही है कि वह पति के घर में रहकर पति सेवा और गृहस्थ धर्म का पालन करें। नारद जी ने श्रद्धा से हाथ जोड़कर कहा हे धर्मराज आपने मेरी शंका दूर कर दी और साथ ही समस्त मानव जाति के लिए भी यह अमूल्य उपदेश दिया है।

मैं वचन देता हूं कि पृथ्वी पर जाकर इस कथा और इससे मिलने वाली शिक्षा का प्रचार अवश्य करूंगा। यमराज ने प्रसन्न होकर देवर्षि नारद को आशीर्वाद दिया। नारद जी नारायण नारायण का जयघोष करते हुए यमलोक से विदा होकर पृथ्वी लोक की ओर लौट गए।


दोस्तों, आशा है आपको यह कथा सुनकर कुछ नया सीखने को मिला होगा। आपको यह कथा कैसी लगी? कृपया कमेंट करके हमें जरूर बताएं। यदि जानकारी अच्छी लगी हो, तो वीडियो को लाइक करना ना भूलें। कमेंट में जय श्री कृष्ण अवश्य लिखें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें। आप सभी का हार्दिक

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