श्री कृष्ण कहते है,पति को वश में करने वाली स्त्री को भोगना पडता है ये जन्म|कलयुग में भजन


नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है।श्री कृष्ण कहते है, एक छिपकली ने बताया है कि जो स्त्री अपने पति को वश में रखती है और जो पति अपनी पत्नी को दासी बनाकर रखता है, उनके साथ क्या होता है?

अगर आपके भी घर में छिपकलियां रहती है तो उन छिपकलियों का और क्या आपका पूर्व जन्म का एक गहरा संबंध है। आखिर वह छिपकलियां आपके ही घर में क्यों आती है? उनकी कौन सी इच्छाएं होती है? क्यों आपकी पत्नी उन छिपकलियों से क्यों डरती है या उनसे इतनी नफरत क्यों करती है? इसके पीछे बहुत ही गहरा रहस्य है जो श्री कृष्ण ने देवर्षि नारद जी को बताया है।

इसीलिए आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़िएगा। इसमे आपको सब समझ में आ जाएगा कि आपके घर की छिपकलियों का और आपका पूर्व जन्म का कोई संबंध है। तो चलिए दोस्तों बिना देरी किए आपको बताते हैं।

एक समय की बात है। देवर्षि नारद ने विनम्र होकर श्री कृष्ण से पूछा हे माधव कृपा करके मुझे बताइए कि जो स्त्री अपने पति को वश में करने के लिए तरह-तरह के उपाय करती है, उसे अपने कर्मों का कैसा फल मिलता है? पति को वश में रखने वाली स्त्री को क्या होता है?

श्री कृष्ण कहते है,क्या पति भी पत्नी को दासी बनाकर रखता है?

श्री कृष्ण कहते है,नारद जी की जिज्ञासा पर मंदस स्मित किया और बोले नारद जी तुम्हारा प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। विवाह जैसे पवित्र बंधन में पतिप एक दूसरे के पूरक होते हैं। किंतु यदि पत्नी अपने अहंकार या मोहवश पति को वश में करने का प्रयास करें तो परिणाम बहुत दुखद हो सकते हैं।

श्री कृष्ण कहते है,पति भी पत्नी को दासी बनाकर रखता है

उसे भी इसका फल भोगना पड़ता है। इस विषय में एक प्राचीन इतिहास है जो आज मैं तुम्हें सुनाता हूं। तुम इसे ध्यान से सुनो। जो भी पति-पत्नी इस कथा को ध्यान से पूरा पडते हैं, वे सदैव सुखी, सौभाग्यशाली और समृद्ध हो जाते हैं। भगवान श्री कृष्ण नारद को कथा सुनाने लगते हैं।

देवर्षि प्राचीन काल की बात है। उस समय रुक्मांगद नाम के एक पराक्रमी और धर्म परायण राजा राज्य करते थे। राजा रुक्मांगद भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे और सदैव धर्म का पालन करते थे। उनकी पत्नी रानी मोहिनी अत्यंत रूपवती और सद्गुणों से संपन्न थी। राजा और रानी में गहरा प्रेम तथा आदर था।

एक दिन राजा रुक्मांगद अपनी प्रिय रानी मोहिनी के साथ विहार करने निकले। उन्होंने मनोरम मंद्राचल पर्वत पर घूमने जाने का निश्चय किया। दोनों राजसी अश्व पर सवार होकर पर्वत की ओर चल पड़े। वहां पहुंचकर राजा ने अपने घोड़े की लगाम खोल दी ताकि वह स्वतंत्र होकर हरी घास चर सके और वे दोनों थोड़ी देर पैदल प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने लगे।

श्री कृष्ण कहते है पति को वश में करने वाली स्त्री को भोगना पडता है

सुरम्यवादियों में वे कुछ समय तक सुकून भरे मन से घूमते रहे। पर्वत की हरीभरी घाटियां, पक्षियों का मधुर कलरव और मंद सुगंध पवन ने उनके हृदय को प्रसन्न कर दिया। समय का भान ना रहा और संध्या होने को आई तो राजा रानी ने लौटने का विचार किया। वे उस स्थान की ओर वापस आने लगे जहां उनका घोड़ा चर रहा था।

राजा रुकमांगद ने दूर से देखा कि उनका शक्तिशाली घोड़ा बड़ी बेचैनी से अपने अगले खुरों से जमीन खोद रहा है। घोड़े की टापें
वज्र के समान कठोर थी और जोर-जोर से भूमि पर चोट कर रही थी। ऐसा प्रतीत हुआ मानो घोड़ा धरती के भीतर कुछ तलाश कर रहा हो या किसी चीज से घबराकर भूमि पर प्रहार कर रहा हो।

राजा चिंतित हो उठे और बोले मोहिनी देखो तो सही हमारा अश्व इस तरह धरती क्यों खोद रहा है? अवश्य ही जमीन के नीचे कोई जीव फंसा होगा। रानी मोहिनी ने भी वह दृश्य देखा और घबरा गई। राजा रुक्मांगत तुरंत घोड़े की ओर तेजी से बढ़े और लगाम पकड़ कर उसे शांत करने लगे। घोड़ा हिनहिनाकर पृथ्वी को कुरेदना बंद नहीं कर रहा था।

राजा और रानी ने पास जाकर नजर डाली तो पाया कि घोड़े के खुर एक जीव को चोट पहुंचा रहे हैं। राजा और रानी के निकट पहुंचने तक घोड़े ने जमीन को काफी कुरेद डाला था। घोड़े के प्रहार से मिट्टी चारों ओर बिखर रही थी।स्त्री उन्होंने देखा कि धरती की मिट्टी में से एक छोटी सी छिपकली घबराई हुई बाहर निकलने का प्रयास कर रही है। बेचारी छिपकली वहीं किसी बिल में रहती थी

घोड़े की टापों से उसका निवास स्थान उजड़ चुका था। वह जान बचाने को इधर-उधर भाग रही थी। अभी वह छिपकली पूरी तरह बाहर निकल भी नहीं पाई थी कि घोड़े के एक तीखे और भारी प्रहार से उसका नन्हा सा शरीर बुरी तरह घायल हो गया। घोड़े के खुर के सीधे आघात से छिपकली लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़ी और अचेत हो गई।

उसका नाजुक शरीर दर्द से फट गया था। दयालु राजा रुक्मांगद ने यह हृदय विदारक दृश्य देखा तो उनका हृदय करुणा से भर उठा। एक क्षण पूर्व तक वे प्रसन्न चित्त थे। पर अब उनकी आंखों में उस निरीह प्राणी के लिए दया उमड़ आई। उन्होंने तुरंत घोड़े की लगाम खींचकर उसे रोका और तेजी से घायल छिपकली की ओर बढ़े।

श्री कृष्ण कहते है पति को वश में करने वाली स्त्री को भोगना पडता है ये जन्म |

राजा ने वृक्ष से कुछ बड़े कोमल पत्ते तोड़े और सावधानी पूर्वक उन पत्तों की सहायता से छिपकली के चोटिल शरीर को घोड़े के खुर के नीचे से उठाया। छिपकली का शरीर निष्प्राण सा लग रहा था और वह मूर्छित अवस्था में थी। रानी मोहिनी भी राजा के साथ वहां पहुंच चुकी थी।

राजा रुक्मांगद ने उस अचेत पड़ी छिपकली को बड़े प्यार से घास फूस बिछी जमीन पर रखा। छिपकली की सांसों की डोर टूटने को थी। उसका नन्हा सा शरीर अभी भी कांप रहा था। वह जीवित तो थी पर तीव्र पीड़ा के कारण बेहोश हो चुकी थी। राजा ने चिंतित होकर रानी से कहा, सुंदरी तुरंत स्वच्छ और शीतल जल ले आओ। यह नन्ही छिपकली हमारे घोड़े के नीचे दबकर मूर्छित हो गई है।

इसे जल्दी जल से सींचना होगा। तभी यह बच पाएगी। स्वामी की आज्ञा पाते ही रानी मोहिनी तुरंत पास ही के झरने की ओर भागी।श्री कृष्ण कहते है, कुछ ही पलों में वे अपने हाथों में शीतल निर्मल जल भरकर लौट आई। राजा ने झुककर अपने हाथों से वह ठंडा पानी छिपकली के शरीर पर धीरे-धीरे छिड़कना शुरू किया। शीतल जल की बूंदे गिरते ही मानो चमत्कार हुआ।

बेहोशी के अंधेरे में डूबी उस छिपकली के शरीर में धीरे-धीरे हरकत होने लगी। थोड़ी देर तक राजा उसे जल से सींचते रहे और मोहिनी पास खड़ी आशा भरी दृष्टि से यह दृश्य देखती रही। अंततः शीतल जल के अभिषेक से छिपकली ने आंखें खोल दी। उसकी मूर्छा टूटी और चेतना लौट आई। घायल होने के कारण उसके शरीर में अत्यंत पीड़ा थी।

फिर भी उसने करवट लेकर अपनी नन्ही आंखों से राजा को देखा। राजा रुक्मांगद ने राहत की सांस ली और कोमल स्वर में बोले भगवान का शुक्र है। यह अब चेतना में आ गई है। रानी मोहिनी ने भी संतोष व्यक्त किया। हां स्वामी ठंडे पानी से इसे सचेत होते देर नहीं लगी। आपने बिल्कुल ठीक समय पर इसे बचा लिया। छिपकली कुछ क्षण तक दर्द से करवट बदलती रही।

फिर उसने मानो साहस जुटाकर अपनी आंखें पूरी तरह खोली। सामने राजदंपत्ति को खड़े देख वह समझ गई कि इन्हीं केश्री कृष्ण कहते है, प्रयास से उसकी जान बची है। उस निरीह जीव ने कृतज्ञता भरी दृष्टि से राजा रुक्मांगद की ओर देखा। राजा ने दयालु मुस्कान के साथ उसके सिर पर हल्का सा स्पर्श किया। मानो आश्वासन दे रहे हो कि अब वह सुरक्षित है। तभी एक अद्भुत घटना घटी।

जमीन पर पड़ी वह साधारण सी छिपकली सहसा मानवीय शब्दों में बोलने लगी। दुर्बल और कांपती आवाज में उसने राजा को संबोधित किया। महाबाहु रुक्मांगद महाराज आपने मुझ पर जो अनुग्रह किया है, उसके लिए मैं हृदय से आभारी हूं। आप जैसे पुण्यवान राजा के सानिध्य में आने से मुझे अब सब कुछ ज्ञात हो गया है। यह सुनकर राजा और रानी दोनों आश्चर्य में पड़ गए।


अरे यह क्या? यह छिपकली तो मनुष्य की वाणी में बात कर रही है। राजा ने हाथ जोड़कर उस छिपकली से पूछा हे देवी आप कौन हो और आपकी ऐसी दशा किस कारण से हुई है और आप मनुष्य के वाणी में बात कैसे कर पा रही है? कृपया मुझे अपना वृतांत विस्तार से सुनाओ ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं। तब वह छिपकली बोलने लगी।

राजन कृपया मेरी बात सुने। मैं कोई साधारण छिपकली नहीं हूं बल्कि अपने पूर्व जन्म के कर्म फल भोग रही एक पापिनी आत्मा हूं।श्री कृष्ण कहते है, अगर आपकी कृपा ना होती तो आज मेरा जीवन समाप्त हो जाता। आज जब आपके जैसे भगवान विष्णु के परम भक्त का सानिध्य मुझे प्राप्त हुआ तो मुझे मनुष्य की तरह वाणी प्राप्त हो गई और मुझे मेरे पूर्व जन्म के सभी कर्म भी याद आ गए हैं।

इसीलिए मैं आपको मेरे पूर्व जन्म का चरित्र सुनाती हूं। तभी आपको मेरे इस दुख का कारण समझ में आएगा। उस छोटे से प्राणी के ऐसे वचन सुनकर राजा रुक्मांगद भी आश्चर्यचकित थे। किंतु वे धर्म और अध्यात्म के गढ़ रहस्यों से भलीभांति परिचित थे। उन्होंने मन ही मन सोचा कि निश्चय ही यह कोई पूर्व जन्म का प्राणी है जो शापवश या पापवश छिपकली बना है।

उन्होंने तुरंत अपने आश्चर्य को संभाला और पृथ्वी पर झुककर नरम स्वर में बोले हे भोली प्राणी निसंकोच अपना वृतांत सुनाओ। मैं ध्यान पूर्वक सुनूंगा। तुम्हारे कष्ट का कारण जानना हमाराकर्तव्य है। तुम निश्चिंत होकर सब बताओ। छिपकली ने करहाते हुए कहना आरंभ किया महाराज मेरा पूर्व जन्म का नाम पद्मावती था। मैं एक ब्राह्मण की पत्नी थी और रमणीय शाकल नगर में रहती थी।

उस नगर में सुहाने बाग बगीचे और पवित्र मंदिर थे। मेरे पति एक विद्वान ब्राह्मण थे और नगर में उनका सम्मान था। प्रारब्ध वश मुझे रूप और यौवन का वरदान मिला था। मैं देखने में सुंदर थी, युवा थी। गृह कार्य निपुणता से करती थी।श्री कृष्ण कहते है, मैंने मन, वचन और कर्म से अपने पति की सेवा करने में कभी कमी नहीं रखी। फिर भी प्रभु दुर्भाग्य से मैं अपने स्वामी की प्रिय नहीं बन सकी।

मेरे पति न जाने किस कारण मुझसे हमेशा रुष्ट रहते थे। मैं जितना अधिक उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करती, उतना ही वे मुझसे दूर होते गए। वे छोटी-छोटी बात पर मुझ पर क्रोध करते और कठोर वचन कहते थे। उनके तीखे शब्द मेरे हृदय को छल्ली कर देते थे। मैं रात दिन यह सोचकर रोया करती थी कि ऐसा क्या करूं जिससे मेरे स्वामी का स्नेह मुझे मिले।

श्री कृष्ण कहते है,पति को वश में करने वाली स्त्री को भोगना पडता है ये जन्म|कलयुग में भजन

एक पत्नी के लिए इससे बढ़कर पीड़ा क्या होगी कि उसका पति उससे नफरत करें या दूसरों में आसक्त हो। छिपकली बोलने लगी। जी हां राजन मेरे स्वामी का मन मेरे प्रति नहीं था। संभवतः वे किसी दूसरी स्त्री की ओर आकर्षित थे। उनकी बेरुखी और तिरस्कार से आहत होकर मेरे मन में भी धीरे-धीरे क्रोध और प्रतिशोध का भाव घर करने लगा।

जिनसे हम प्रेम करते हैं। यदि वे हमें तिरस्कृत करें तो प्रेम का स्थान कभी-कभी रोष ले लेता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ।श्री कृष्ण कहते है, मैं अंदर ही अंदर ग्लानी और रोश में जल रही थी। आखिर एक दिन क्रोध और दुख में भरकर मैंने निश्चय किया कि अब अपने पति को किसी भी तरह अपने वश में करके रहूंगी। मैं उन्हें दिखा देना चाहती थी कि मेरी उपेक्षा करना उन्हें महंगा पड़ेगा।

मेरे मन में एक दुराव उभर आया था कि चाहे जैसे भी हो मुझे अपने पति के हृदय पर अधिकार प्राप्त करना है। भले ही उसके लिए किसी भी उपाय का सहारा लेना पड़े। उस समय दुख और क्रोध ने मेरे विवेक पर पर्दा डाल दिया था। मैं अपने कर्तव्य पथ से भटक रही थी। यह मुझे तब समझ नहीं आया। मेरे मन में बस एक ही धुन सवार थी।

मुझे अपने पति को वश में करना है। चाहे इसके लिए मुझे किसी तांत्रिक उपाय का ही सहारा क्यों ना लेना पड़े। छिपकली रूपी उस स्त्री की आत्मा ने गहरी सांस ली और फिर बोली ह महाराज अपने विक्षुब्ध हृदय की आग लिए मैं समाधान ढूंढने घर से निकली। मैंने सुना था कि हमारे नगर की कुछ अन्य स्त्रियों ने भी अपने जीवन में ऐसे दुख झेले थे।

लेकिन बाद में उन्होंने कुछ उपाय करके अपने पतियों को फिर से वश में कर लिया था। मैंने निश्चय किया कि पहले मैं उन्हीं स्त्रियों से सलाह लूंगी जो अपने पतियों द्वारा त्यागी या सताई गई थी और जिन्होंने अंततः उन्हें पुनः अपने वश में कर लिया था। मैंने नगर की कुछ बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों से संपर्क किया।

जिनकी कीर्ति ऐसी थी कि उन्होंने वशीकरण द्वारा अपने बिछड़े पतियों को वापस पा लिया था। उन स्त्रियों ने मेरे दुख की गाथा सुनी। वे भी कभी मेरे जैसी ही पीड़ित रही थी इसलिए मेरी व्यथा समझ सकती थी। मेरे आंसू और क्रोध से भरे शब्द सुनकर उन्होंने मुझे दिलासा दिया। उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। मानो वे कोई गहरा रहस्य जानती हो।

उनमें से एक ने मुझसे कहा, बेटी, तेरे पति अवश्य तेरे वश में हो जाएंगे। हमने भी अपने जीवन में यही पीड़ा झेली है और एक उपाय से हमें सफलता मिली। मैंने उत्सुकता से पूछा, माताओं, कृपया बताइए उस उपाय के बारे में। मैं कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हूं
जिससे मेरे पति का हृदय बदल जाए। दूसरी स्त्री बोली, यहां हमारे नगर से कुछ दूर एक सिद्ध साध्वी रहती है।

वे एक सन्यासिनी है। तंत्र मंत्र और औषधियों में उन्हें बड़ी सिद्धि प्राप्त है। हम सबके पतियों को उन्होंने ही अपनी दी हुई औषधि और मंत्रों के प्रताप से वश में करा दिया। तुम्हारे लिए भी वही एक उपाय है। तुम उस सन्यासिनी के पास जाओ। वे तुम पर अवश्य दया करके मदद करेंगी। उन स्त्रियों की बात सुनकर मेरे मन में आशा जगी। मुझे लगा मानो अंधेरे में एक रास्ता मिल गया हो।

मैंने तुरंत निर्णय लिया कि मैं उस सन्यासिनी के पास जाऊंगी। उन औरतों ने मुझे सन्यासिनी का ठिकाना समझा दिया। वह श्री कृष्ण कहते है,नगर के बाहर एक घने वन में एक छोटी कुटिया में रहती थी। अगले ही दिन प्रातः मैं बिना विलंब किए उस वन की ओर चल पड़ी। कुछ दूर पैदल चलने के बाद मुझे पेड़ों के बीच हवा में धुएं और गरबत्ती की सुगंध महसूस होने लगी।

पास जाने पर एक छोटी सी कुटिया दिखी जिसके अंदर से धीमा धुआं उठ रहा था। मेरा हृदय जोर-जोर से धड़कने लगा। लेकिन अपने लक्ष्य को ध्यान में रख मैंने हिम्मत जुटाई और भीतर प्रवेश किया। अंदर धुंध हलका सा था। अगरबत्ती की महक फैली थी और एक दीपक टिमटिमा रहा था।

कोने में राख से ढकी एक धनी जल रही थी। वहीं एक कृषकाय वृद्ध सन्यासिनी आंखें मूंदे बैठी थी। उनकी जटाजूट बिखरी थी और शरीर पर भस्म लगाए वे बड़ी डरावनी प्रतीत हो रही थी। मेरे कदमों की आहट सुनकर उन्होंने धीरे से आंखें खोली। उनकी आंखों की चमक असामान्य थी। मैंने हाथ जोड़कर कांपते स्वर में उन्हें प्रणाम किया और अपना परिचय देते हुए आने का प्रयोजन बताया।

प्लीडिंगली विनीत स्वर में मैंने कहा, माताजी मेरा वैवाहिक जीवन संकट में है। मेरे पति मुझसे घृणा करते हैं और संभवतः किसी अन्य स्त्री में आसक्त हैं। मैं उनके प्रेम के लिए व्याकुल हूं और उन्हें अपने वश में करना चाहती हूं। कृपा करके मेरी सहायता करें। सुना है आप शक्तिशाली औषधियां एवं मंत्र जानती हैं जिससे पति का हृदय परिवर्तन हो जाता है।

श्री कृष्ण कहते है,पति को वश में करने वाली स्त्री को भोगना पडता है ये जन्म|कलयुग में भजन


मेरी बात सुनकर उस तप्विनी के होठों पर एक हल्की मुस्कान आई। उन्होंने भारी आवाज में उत्तर दिया। बेटी तुम्हारा दुख समझ सकती हूं। पति का विचलित होना स्त्री के लिए भारी कष्टदायक है। मैंने कई बहनों की सहायता की है। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी भी सहायता होगी। फिर वे उठकर कुटिया के एक कोने में गई और एक छोटी मंजूषा संदूकची से दो चीजें निकाली।

लौटकर उन्होंने मेरे हाथ में एक छोटी पुड़िया और लाल धागे का बंधा हुआ एक रक्षासूत्र रखा। उन्होंने समझाया, इस पुड़िया में एक विशेष चूर्ण है। इसे आज रात्रि प्रदोष काल में जब संध्या ढल रही हो, एक गिलास दूध में घोलकर अपने पति को पिला देना। यह चूर्ण ग्रहण करते ही तुम्हारे पति के हृदय में तुम्हारे प्रति आकर्षण जाग जाएगा

और वे किसी अन्य स्त्री की ओर देखने का साहस नहीं करेंगे। साथ ही इस रक्षासूत्र को मंत्र सिद्ध किया गया है। इसे उसी समय अपने पति के गले में बांध देना। इसके प्रभाव से तुम्हारे पति का मन भटक नहीं पाएगा और वह तुम्हारी बातों को मानेगा।अगर आपको यह आर्टिकल बहुत पसंद आया हो तो कमेंट में जय श्री कृष्णा अवश्य लिखें धन्यवाद

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