नमस्कार आपका स्वागत है। दोस्तों आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली इंदिरा एकादशी का महत्व अत्यंत अद्भुत है।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,इंदिरा एकादशी के दिन करें इस कथा का पाठ, सभी,यह एकादशी विशेष रूप से पितृ पक्ष में आती है और इसे करने से पितरों का उद्धार होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस व्रत के प्रभाव से पितर स्वर्ग लोक को प्राप्त होते हैं और व्रति स्वयं भी पापों से मुक्त होकर मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।
इस व्रत का पालन करने वाला व्यक्ति न केवल अपने लिए पुण्य अर्जित करता है बल्कि अपने पूर्वजों के लिए भी अमृत तुल्य शांति और तृप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इंदिरा एकादशी की कथा सुनने का भी बड़ा ही महत्व है। यह कथा भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी।
इस कथा को सुनने मात्र से ही मनुष्य के कोटि-कोटि पाप नष्ट हो जाते हैं। उसे पितरों की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में सुख समृद्धि आती है। इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को इस कथा को ध्यान से सुनना चाहिए। तो चलिए आपको सुनाते हैं
इंदिरा एकादशी की कथा प्राचीन सतयुग में महिष्मती नाम की नगरी में इंद्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। राजा इंद्रसेन धर्म परायण और विष्णु के अनन्य भक्त थे। उनकी प्रजा सुखी थी और राज्य में सर्वत्र समृद्धि थी। प्रजा राजा इंद्रसेन की उदारता और न्यायप्रियता के लिए उनकी प्रशंसा करती थी।
राजा प्रतिदिन प्रभात काल में स्नान उपरांत भगवान विष्णु की पूजा तथा यज्ञ दान जैसे सत्कर्मों में लीन रहते थे। एक दिन राजा इंद्रसेन अपने राजभवन की सभा में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे। उनके आसपास मंत्री, सभासद और प्रहरी आदर पूर्वक उपस्थित थे। वातावरण शांत और भव्य था और दूर तक महिष्मती की राजसभा की कीर्ति फैली हुई थी।

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,उसी समय आकाश मार्ग से देवलोक के विख्यात नारद मुनि पृथ्वी पर उतर आए। उनके हाथ में वीणा थी और मुख से नारायण नारायण का उच्चारण हो रहा था। देवर्षि नारद की आगमन की आभा से पूरी सभा आलोकित हो उठी। नारद मुनि को अचानक दिव्य रूप में सभागार में अवतरित होते देख राजा इंद्रसेन तुरंत आसन छोड़कर खड़े हो गए। राजा ने श्रद्धा पूर्वक हाथ जोड़कर नारद जी का स्वागत किया और बोले हे देवर्षि नारद हमारे भाग्य उदय हो गए कि आज आप हमारे यहां पधारे हैं।
कृपया स्वर्ण आसन पर विराजिए और हमें धन्य कीजिए। राजा ने विधि पूर्वक मुनिवर को आसन एवं अर्घ्य अर्पित किया। नारद मुनि राजा के अभिवादन को स्वीकार करते हुए आसन ग्रहण कर शांत भाव से बैठ गए। सभा के सभी सदस्य देवर्षि नारद को आदर पूर्वक निहार रहे थे। राजा इंद्रसेन ने हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वकपूछा हे मुनिवर कृपा करके बताएं

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,आज हमारे राज्य में आपके आगमन का शुभ कारण क्या है? आपकी आगवानी से हमारा राज्यपवित्र हो गया है। आशा है कि सब कुशल मंगल है। राज दरबार में गूंजती राजा की मधुर वाणी से सम्मान झलक रहा था। नारद मुनि ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया, हे राजन, तुम्हारे राज्य की समृद्धि और धर्म परायणता देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम बुद्धिमत्ता से राज्य का संचालन कर रहे हो और तुम्हारा मन निरंतर भगवान विष्णु की भक्ति में लगा है।
यह अत्यंत प्रशंसनीय है। नारद जी कुछ क्षण के लिए रुके और फिर गंभीर स्वर में बोले, राजन, मैं आज एक विशेष उद्देश्य से तुम्हारे पास आया हूं। मेरे वचनों को ध्यान पूर्वक सुनो। यह समाचार तुम्हें आश्चर्यचकित कर देगा। राजा इंद्रसेन मुनि के शब्द सुनकर
गंभीर हो गए और समस्त सभा भी मौन होकर ध्यान से सुनने लगी। नारद मुनि ने कहना प्रारंभ किया, हे राजन, कुछ समय पूर्व की बात है। ब्रह्मलोक से यात्रा करते हुए मैं यमलोक पहुंचा।
वहां यमराज की सभा में मेरा आदर पूर्वक स्वागत हुआ। यमराज जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। अत्यंत न्यायकारी देव हैं। मैं यमलोक में श्रद्धा पूर्वक यमराज का गुणगान कर रहा था कि तभी मेरी दृष्टि एक आत्मा पर पड़ी जो वहां यमराज की सभा में उपस्थित थी। वह आत्मा तेजस्वी प्रतीत हो रही थी।

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,परंतु उसके मुखमंडल पर उदासी थी। मैं चकित हुआ कि ऐसी पुण्य आत्मा यमलोक में क्यों ठहरी है। तब यमराज से विनम्रता पूर्वक निवेदन कर मैंने उस आत्मा के विषय में पूछा। यमराज ने बताया कि यह आत्मा पृथ्वी लोक के एक धर्मात्मा राजा की आत्मा है जो किसी कारणवश अभी स्वर्ग नहीं जा सकी है। अनुमति पाकर मैं उस आत्मा के निकट गया। जब मैं समीप गया तो वह आत्मा मुझे पहचान गई। उसने आदर से हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन किया। मैंने उसे संतप्त देखकर पूछा, हे
आत्मदेव आप कौन हैं और किस कारण यहां यम सभा में स्थित हैं? क्या मुझसे कोई सहायता की अपेक्षा है? मेरी बात सुनकर उस आत्मा की आंखों में आशा का प्रकाश जागा। उसने करुण स्वर में कहा हे देवर्षि नारद मैं पृथ्वी लोक पर महिष्मती नगरी का पूर्व नरेश राजा इंद्रसेन का पिता हूं। मैंने अपने जीवन में अनेक यज्ञ और पुण्य कर्म किए।
भगवान विष्णु की भक्ति भी की। परंतु पूर्व काल में एक बार मुझसे अश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत भंग हो गया था। उसी व्रत के पूर्ण ना हो पाने के कारण मुझे अभी स्वर्ग लोक में स्थान नहीं मिल पाया है। मैं यमलोक में प्रतीक्षा कर रहा हूं। यह सुनकर मुझे अत्यंत विस्मय हुआ और दुख भी। वो आत्मा आगे बोली, हे मुनिवर, मैंने अपने पुत्र इंद्रसेन को सपने में संकेत देने का
प्रयास किया।

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,किंतु जीवित व्यक्तियों तक हमारी बात पहुंचना अत्यंत कठिन है। अब केवल आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं। कृपा करके मेरे पुत्र तक मेरा संदेश पहुंचा दीजिए। यदि मेरा पुत्र आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी जिसे इंदिरा एकादशी कहते हैं का विधि पूर्वक व्रत मेरे निमित्त कर दे तो मुझे अधोगति से मुक्ति मिल सकती है। इस व्रत के पुण्य से मुझे स्वर्ग या विष्णु लोक प्राप्त होने में सहायता होगी।
कृपया मेरे पुत्र से विनती कीजिए कि वह पितृ ऋण उतारने हेतु मेरे उद्धार का उपाय करें। इतना कहते कहते उस आत्मा का स्वर भर्रा गया और आंखों में आशा के आंसू झलक आए। उस क्षण यमराज ने भी सहमति में सिर हिलाया और मुझसे कहा, देवर्षि यह आत्मा सचमुच एक धर्मात्मा राजा की है।
इसके पुण्यों के बावजूद एकादशी व्रत के बाधित हो जाने से इसे यह स्थिति भोगनी पड़ रही है। यदि इसके पुत्र इंद्रसेन द्वारा विधि पूर्वक इंदिरा एकादशी का व्रत किया जाए और उस व्रत का पुण्य इसे अर्पित किया जाए तो निश्चय ही इसे स्वर्ग लोक जाने का मार्ग मिल जाएगा।

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,यह विधि शास्त्र सम्मत है जिससे पितृ त्राण होता है। आप कृपा करके पृथ्वी लोक जाकर राजा इंद्रसेन को सूचित करें। यमराज के वचन सत्य और करुणामय थे। मैंने ततक्षर उस आत्मा को आश्वासन दिया। हे धर्मात्मन मैं अवश्य तुम्हारे पुत्र तक यह संदेश पहुंचाऊंगा। तुम चिंता मत करो। भगवान कीकृपा से सब शुभ होगा। मेरी इस प्रतिज्ञा से वह आत्मा हल्की हो गई और उसके मुख पर आशा की किरण दिखाई दी।
यमराज ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया और मैं तत्काल वहां से विदा लेकर देवलोक से होता हुआ सीधा तुम्हारी सभा में उपस्थित हुआ हूं। नारद मुनि की बातें सुनकर राजा इंद्रसेन की आंखें आश्चर्य एवं भावुकता से भर आई। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि उनके पूज्य पिता श्री यमलोक में अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। राजा का हृदय द्रवित हो उठा और आंखों में अश्रु छलक आए।
उसने गंभीर स्वर में कहा हे देवर्षि नारद यह मेरा परम सौभाग्य है कि मेरे पिताजी ने आपके माध्यम से मुझे यह संदेश भेजा है। पिता के उद्धार से बढ़कर मेरे लिए और क्या कर्तव्य हो सकता है? कृपया मुझे बताइए कि मैं इंदिरा एकादशी का यह व्रत किस विधि से करूं जिससे पिताजी को मोक्ष प्राप्त हो। राजा की वाणी में दृढ़ संकल्प झलक रहा था।
नारद जी ने राजा इंद्रसेन के भाव देख प्रसन्नता से मुस्कुराकर कहा राजन तुम्हारे हृदय में अपने पितृ के लिए इतना प्रेम और श्रद्धा है। यह प्रशंसनीय है। निश्चय ही इंदिरा एकादशी का व्रत संपन्न करने से तुम्हारे पिता श्री को स्वर्ग प्राप्ति होगी। अब ध्यान पूर्वक व्रत की विधि सुनो जिसे स्वयं भगवान श्री हरि ने शास्त्रों में बताया है।
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राजा इंद्रसेन समेत पूरी सभा मंत्रमुग्ध होकर नारद जी के वचन सुनने लगी। नारद मुनि ने विस्तार से व्रत की प्रक्रिया समझानी शुरू की। हे राजन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि से ही यह अनुष्ठान प्रारंभ होता है। दशमी के दिन प्रातः काल पवित्र नदियों या सरोवर में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करो। उस दिन दोपहर के समय पुनः स्नान कर शुद्धि कर लेना उचित होगा।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,दशमी तिथि को ही श्राद्ध कर्म संपन्न करना है। अपने पितरों के निमित्त विधि पूर्वक श्रद्धा सहित तर्पण और श्राद्ध करो। योग्य
ब्राह्मणों को आदर पूर्वक भोजन कराओ तथा यथाशक्ति दान दक्षिणा दो। उस दिन स्वयं एक ही बार सात्विक भोजन ग्रहण करें। वह भी सूर्यास्त से पूर्व। भोजन भी बहुत हल्का एवं संयमित हो जिससे अगले दिन व्रत का संकल्प सुगमता से निभा सको।
निशत काल आने तक मन में पवित्र विचार रखो और भगवान का स्मरण करते हुए शयन करो। फिर जब आश्विन कृष्ण एकादशी की शुभ भोर हो तब प्रातः काल जल्दी उठकर स्नाना आदि कर लो। नित्य कर्म से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का ध्यान करो।
इसके पश्चात इंदिरा एकादशी व्रत का संकल्प लो। व्रत का संकल्प लेते समय मन एकाग्र और भक्ति भाव से पूर्ण हो। प्रतिज्ञा करो आज मैं सभी भौतिक भोगों का त्याग करके निराहार रहकर एकादशी व्रत का पालन करूंगा। हे अचुत हे कमल नयन भगवान विष्णु मैं आपकी शरण में हूं। मेरी रक्षा कीजिए और मेरे पितरों को मोक्ष प्रदान कीजिए।
इस प्रकार हृदय से प्रार्थना करते हुए संकल्प करो। नारद जी के स्वर में मानो स्वयं श्री हरि की शक्ति प्रवाहित हो रही थी। राजा इंद्रसेन और सभा के लोग तन्मय होकर यह विधि सुन रहे थे। नारद जी आगे बोले संकल्प के उपरांत शालिग्राम भगवान अर्थात विष्णु के विग्रह के समक्ष श्रद्धा पूर्वक पितरों हेतु श्राद्ध करना चाहिए। भगवान नारायण साक्षी हैं।
इस भाव से पितरों के निमित्त जल, तिल आदि अर्पित करो। ध्यान रहे एकादशी तिथि में अन्न का सेवन वर्जित है। अतः विधि पूर्वक ब्राह्मणों को फलाहार, फल एवं दूध आदि कराओ। श्रद्धालु ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर सम्मानित करो। पितरों के श्राद्ध से जो अंश बच जाए उसे हाथ से उठाकर सूंघ लो और फिर गौ माता को खिला दो। इसके पश्चात धूप, दीप, चंदन, पुष्प और नैवेद्य आदि अर्पित करके पूर्ण भक्ति भाव से भगवान विष्णु का पूजन करो।

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,प्रभु को तुलसी दल अर्पित करो तथा भगवान के नामों का जप करो। भक्ति भावना से ओतप्रोत होकर भगवान की आरती उतारो। दिन भर मन में भगवान का स्मरण करते रहो और कथा कीर्तन या भजन के माध्यम से स्वयं को भक्ति में निमग्न रखो। एकादशी की रात्रि को भगवान के समीप जागरण करना आवश्यक है। शास्त्रों में रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया गया है।
अतः रात्रि में दीप प्रज्वलित करके भगवन नाम संकीर्तन कथा श्रवण तथा श्री हरि के गुणों का चिंतन करो। पूरी रात जागरण करो और एक पल को भी निद्रा में ना जाओ। अब आगे द्वादशी तिथि के प्रातः काल की विधि सुनो। जब अगले दिन सूर्योदय हो तब भगवान विष्णु की पुनः पूजा करो। तुलसी दल सहित पवित्र जल अर्पित करो। पुष्प तथा धूप दीप चढ़ाओ। इसके उपरांत ब्राह्मणों को आदर पूर्वक भोजन करवाओ।
अपनी सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर उन्हें विदा करो। ध्यान रहे द्वादशी तिथि में भोजन करने से पूर्व कुछ समय मौन रहना चाहिए। तुम्हारे भाई बंधु, स्त्रियां एवं पुत्रादि सभी पहले मौन रहकर मन ही मन भगवान को धन्यवाद दो। तब व्रत खोलो। इस प्रकार विधि पूर्वक इंदिरा एकादशी का व्रत पूर्ण होगा। कहकर नारद मुनि शांत हो गए।
राजा इंद्रसेन ने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा हे देवर्षि आपने इतनी विस्तार से व्रत की विधि बताकर हम पर बड़ा अनुग्रह किया है। मैं निश्चित रूप से पूरे भक्ति पूर्वक इस व्रत का पालन करूंगा। पिता श्री के उद्धार हेतु यह मेरा परम कर्तव्य है और साथ ही सौभाग्य भी कि भगवान ने मुझे यह अवसर दिया। राजा सहित सभा के सब जनों ने मुनि को फिर प्रणाम किया।
अगले ही क्षण नारद मुनि अंतर्ध्य हो गए और देवलोक को लौट गए। उनकी दिव्य उपस्थिति जाते ही सभागार में सामान्य अवस्था लौट आई। परंतु अब राजा के हृदय में उत्साह और भक्ति भाव की लहर उमड़ रही थी। नारद जी के निर्देशानुसार राजा इंद्रसेन ने तुरंत व्रत की तैयारियां आरंभ करवा दी।
उन्होंने अपने समस्त परिजनों, मंत्रियों तथा नगरवासियों को सूचित किया कि आने वाली आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी को इंदिरा एकादशी व्रत रखा जाएगा। राजा ने स्वयं सभी को व्रत की महिमा और विधि समझाई तथा पितरों के उद्धार हेतु सभी को मन से सहभागी होने का आग्रह किया।
पूरे राज्य में यह समाचार फैल गया कि राजा स्वयं पितृ श्राद्ध तथा इंदिरा एकादशी व्रत का नेतृत्व करेंगे। समय बीतने लगा और वह पावन तिथि निकट आ गई। दशमी के दिन प्रातः काल होते ही राजा इंद्रसेन अपने परिवार सहित नदी तट पर गए। शरद ऋतु का सुहावना प्रभात था।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,इंदिरा एकादशी के दिन करें इस कथा का पाठ, सभी,सुनने से गरीबी दूर होती है

सूर्य की कोमल किरणें जल पर पड़कर स्वर्ण समान चमक रही थी। राजा ने पवित्र नदी के जल में स्नान कर त्रिपुंड धारण किया और सूर्य को अर्घ्य दिया। उनके साथ रानी, राजकुमार तथा मंत्रीगण सभी ने विधि पूर्वक स्नान करके प्रार्थना की। दोपहर के समय पुनः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए गए।
राजा इंद्रसेन ने राजमहल के प्रांगण में पितरों के श्राद्ध के लिए भव्य व्यवस्था करवाई थी। वेद पाठी ब्राह्मणों को आदर पूर्वक आमंत्रित किया गया। राजा ने कुश और तिल लेकर संकल्प किया तथा अपनेपितरों का विधिवत तर्पण किया। पवित्र जल, दूध और तिल अर्पित कर दिवंगत पितृ गणों की आत्मा की शांति की प्रार्थना की।
श्राद्ध कर्म के उपरांत ब्राह्मणों को सादर भोजन कराया गया। स्वादिष्ट सात्विक व्यंजन परोसे गए। राजा व उनके परिवार ने स्वयं उस दिन केवल एक बार अत्यंत हल्का सात्विक भोजन सूर्यास्त से पूर्व ग्रहण किया तथा रात्रि में केवल फलाहार या दूध लिया। अगले दिन प्रातः होते ही इंदिरा एकादशी का शुभ दिवस उदय हुआ।

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,राजा इंद्रसेन प्रभात की वेला में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर राजमहल के मंदिर में पहुंचे। वहां शंखनाद और वैदिक मंत्रोार के बीच उन्होंने भगवान विष्णु की प्रतिमा के सम्मुख धूप दीप जलाकर मस्तक झुकाया। राजा इंद्रसेन ने उज्जवल मुख से हाथ जोड़कर संकल्प लिया हे देव आज मैं नियम पूर्वक इंदिरा एकादशी का व्रत करता हूं।
मैं अन्न जल का त्याग कर दिन भर आपके चरणों की भक्ति करूंगा। कृपया मेरी इस तपस्या को स्वीकार करके मेरे पितरों को मोक्ष का मार्ग प्रदान करें। उनके पीछे रानी तथा राज परिवार के अन्य सदस्यों ने भी व्रत का संकल्प दोहराया। दिन चढ़ने पर राजा इंद्रसेन ने यथाविधि शालिग्राम शिला का पूजन किया।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,भगवान श्री हरि को चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित किए गए। मंदिर में राजपुरोहित के निर्देशन में विधि विधान पूर्वक पितरों के निमित्त पुनः तर्पण किया गया। इस विशेष श्राद्ध में अन्न के स्थान पर फल और दूध अर्पित किया गया। राजा ने योग्य ब्राह्मणों को निकट बिठाकर अपने हाथों से फलाहार कराया।
उन्हें वस्त्र और दक्षिणा देकर सम्मान पूर्वक विदा किया गया। श्राद्ध का अंश जो शेष बचा राजा ने श्रद्धा से अपने कर कमलों में लेकर आंखें बंद करके उसे सूंघा और फिर प्रेम पूर्वक गौ को खिला दिया। इसके पश्चात राजा ने भगवान विष्णु के चरणों में प्रणिपात कर प्रार्थना की हे नारायण मेरे इस व्रत को स्वीकार करें और मेरे पितरों पर कृपा करें।

Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,एकादशी के दिन राजा और समस्त परिवार निराहार रहे। केवल फलाहार और जल ग्रहण किया गया। वह भी सीमित मात्रा में और संध्या तक ही। दिनभर महिष्मती नगरी में भजन कीर्तन गूंजते रहे। राजा स्वयं भक्ति भाव से भगवान की स्तुति में लीन रहे। चारों ओर भगवान के पवित्र नाम की ध्वनि प्रवाहित हो रही थी। जिससे संपूर्ण वातावरण सात्विक आनंद से भर उठा था।
रात होते ही राजमहल के प्रांगण में भगवत भजन के साथ जागरण आरंभ हुआ। दीपों की ज्योति में भक्तजन भजन कथा तथा हरि नाम संकीर्तन में लीन रहे। राजा इंद्र सेन स्वयं पूरी निष्ठा से जागरण में शामिल थे। उनकी आंखों में थकान का लेश नहीं था बल्कि भक्ति की ज्योति जल रही थी।
समूची रात्रि इसी प्रकार भक्ति में व्यतीत हो गई। जब प्रातः काल हुआ और द्वादशी की सुनहरी भोर उदित हुई तब राजा इंद्रसेन ने शास्त्रोक्त विधि से भगवान विष्णु की अंतिम पूजा संपन्न की। सूर्योदय के समय पुनः शंख ध्वनि हुई और वैदिक मंत्रोार के साथ राजा ने तुलसी दल तथा पवित्र जल भगवान को अर्पित किया।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,सुगंधित पुष्प भगवान के चरणों में चढ़ाए गए। इसके बाद राजमहल के अतिथि कक्ष में अनेक ब्राह्मणों को आदर पूर्वक आमंत्रित करके बैठाया गया। राजा इंद्रसेन ने स्वयं सेवा भाव से भोजन परोसा। सात्विक एवं स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। तृप्त होकर ब्राह्मणों ने राजा को आशीर्वाद दिया। उन्हें वस्त्र तथा दक्षिणा भेंट कर आदर पूर्वक विदा किया गया।

पारणा से पूर्व राजा ने परिवार सहित भगवान का स्मरण करते हुए कुछ क्षण मौन साधना की। तदंतर विधि पूर्वक पारणा किया गया। जो ही राजा इंद्रसेन ने व्रत पूर्ण होने पर पहला ग्रास मुख में रखने को उद्यत हुए। त्यों ही एक अद्भुत घटना घटी। सहसा आकाश से सुगंधित पुष्पों की वर्षा होने लगी। चमेली, मंदार, मालती, कमल आदि रंग बिरंगे पुष्पों की वर्षा ने समूचे प्रांगण को ढक दिया।
अचानक दिव्य नगाड़ों और धुंदुभियों की ध्वनि आकाश में गूंज उठी। उपस्थित लोग चकित होकर आकाश की ओर देखने लगे। राजा इंद्रसेन स्वयं आसन से उठकर खड़े हो गए और आकाश की ओर निहारने लगे। देखतेदे एक विशाल दिव्य प्रकाश पुंज आकाश से पृथ्वी पर उतरने लगा। वह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ पर आरूढ़ एक तेजस्वी पुरुष थे।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,सोने से चमकते पंखों वाले उस गरुड़ की फड़फड़ाहट से आकाश गूंज रहा था। उसके ऊपर एक दिव्य पुरुष विराजमान थे जिनके मुख मंडल से आलोक निकल रहा था। यह और कोई नहीं बल्कि स्वयं राजा इंद्रसेन के पिता श्री थे जो अब दिव्य शरीर धारण किए प्रकट हुए। उनके मुख पर प्रसन्नता और कृतज्ञता का तेज था।
राजा इंद्रसेन ने यह दिव्य दृश्य देखा तो हर्ष मिश्रित विस्मय से अभिभूत हो उठे। उन्होंने तुरंत दोनों हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। पिता के प्रति आदर और प्रेम से उनकी आंखें छलछला आई। आकाश में गरुड़ वाहन पर विराजे पिता की आंखों में भी स्नेहाश्रु थे। परंतु अब उनके मुख पर दुख का लेश नहीं था।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,केवल आनंद और शांति का प्रकाश था। दूर आकाश से पिता ने पुकार कर कहा हे पुत्र इंद्रसेन तुम्हारे व्रत और भक्ति के पुण्य से मेरी मुक्ति हो गई है। तुमने पुत्र धर्म निभाकर मेरा उद्धार कर दिया। मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूं। भगवान विष्णु की कृपा से अब मुझे विष्णु लोक जाने का सुवसर मिला है।

तुम्हें असीम आशीर्वाद। जिस प्रकार तुमने अपने पितृ के प्रति कर्तव्य निभाया है, उससे तीनों लोकों में तुम्हारा यश फैलेगा। सदा इसी प्रकार धर्म के मार्ग पर चलते रहो। पिता के यह शब्द अमृत की भांति राजा के हृदय में उतरे। राजा इंद्रसेन की आंखों से आनंद और भक्ति के अश्रू बह निकले।
उन्होंने कांपती आवाज में उत्तर दिया, पिता श्री यह सब भगवान विष्णु की अनुकंपा और आपकी कृपा का परिणाम है। मैं धन्य हो गया कि मुझे आपका उद्धार करने का सौभाग्य मिला। आप सदैव मेरे हृदय में विराजमान रहेंगे। कृपया विष्णु लोक में प्रभु की शरण पाकर वहीं से मेरा मार्गदर्शन करते रहिएगा। पिता ने प्रेम पूर्वक हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,तभी आकाश से एक गंभीर दिव्य ध्वनि गूंजी। पुत्र इंद्रसेन तुम्हें भी शीघ्र ही स्वर्ग लोक में स्थान प्राप्त होगा। अपना जीवन पूर्ववत धर्म पूर्वक व्यतीत करते रहो। यह आवाज स्वयं भगवान विष्णु की थी जो अदृश्य रहकर भी अपने भक्त को आश्वस्त कर रहे थे। राजा इंद्रसेन और समस्त उपस्थित जनों ने वह दिव्य वाणी सुनकर श्रद्धा से सिर झुका दिया।
सभी ने देखा कि गरुड़ पर विराजमान राजा के पिता धीरे-धीरे आकाश में ऊपर उठने लगे। दिव्य विमान आगे बढ़ता गया और अंततः सबकी आंखों से ओझल होकर स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान कर गया। पुष्पों की सुगंध अब भी वातावरण में बसी हुई थी और सभी के हृदय में अनुपम श्रद्धा का संचार हो रहा था। राजा इंद्रसेन ने भाव विहवल होकर भगवान को प्रणाम किया और कहा हे नारायण आपकी कृपा से मेरे पिता को मोक्ष मिला।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,इंदिरा एकादशी के दिन करें इस कथा का पाठ, सभी,सुनने से गरीबी दूर होती है

मैं सदा आपका आभारी रहूंगा। राजा के इन शब्दों के साथ ही समस्त जन समूह ने हरि की जय का जयघोष किया और संपूर्ण नगरी भक्ति के उल्लास से गूंज उठी। इसके पश्चात राजा ने व्रत पूर्ण कर अन्न ग्रहण किया। पूरे राज्य में आनंद और श्रद्धा की लहर दौड़ गई। सभी ने राजा इंद्रसेन की पितृ भक्ति और धर्मनिष्ठा की भूरीभूरी प्रशंसा की।
महिष्मती नगरी के जनजन में इंदिरा एकादशी के प्रति अगाध श्रद्धा जाग उठी। राजा इंद्रसेन ने कई वर्षों तक निष्कंटक राज्य किया। अंततः समय आने पर भगवान विष्णु के पार्षद दिव्य विमान लेकर आए और राजा इंद्रसेन को बैकुंठ धाम ले गए। इस प्रकार धर्म पूर्वक जीवन बिताने वाले राजा इंद्रसेन को मोक्ष की प्राप्ति हुई।
Indira Ekadashi Katha:इंदिरा एकादशी संपूर्ण कथा,इस प्रकार पद्म पुराण में वर्णित यह कथा सिद्ध करती है कि आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत महान फलदाई है। इसके प्रभाव से पितरों को मुक्ति एवं सद्गति प्राप्त होती है। जो श्रद्धा पूर्वक यह व्रत करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर अंततः बैकुंठ धाम प्राप्त करते हैं।

इस कथा का श्रवण मात्र भी मनुष्य को पुण्य फल देकर उसके पितरों को तृप्ति और मोक्ष प्रदान करता है। यही इंदिरा एकादशी की पुण्य कथा है जो सुनने और सुनाने से संसार सागर से तरने का मार्ग प्रशस्त करती है।
तो दोस्तों, यह थी इंदिरा एकादशी की कथा। आपको यह कथा पसंद आई तो हमारे आर्टिकल को लाइक जरूर करें और कमेंट में जय श्री हरि विष्णु अवश्य लिखें।धन्यवाद














