नमस्कार मित्रों किस पाप के कारण एक स्त्री सात जन्मों के लिए विधवा हो जाती है प्रिय दर्शकों आज मैं आपको एक ऐसी स्त्री की अद्भुत और शिक्षाप्रद कथा सुनाने जा रहा हूं जिसने अपने कर्मों के फल स्वरूप सात जन्मों तक विधवा होने का दुख सहन किया था यह कथा ना केवल हमें अपने कर्मों के महत्व को समझाती है बल्कि यह भी सिखाती है कि सच्ची भक्ति और पश्चाताप से हमें अपने पापों और कर्म से मुक्त हो सकते हैं तो आइए इस कथा में डूबकर हम सभी सीखें और प्रेरणा ले
नमस्कार मित्रों किस पाप के कारण एक स्त्री सात जन्मों के लिए विधवा हो जाती है प्रिय दर्शकों आज मैं आपको एक ऐसी स्त्री की अद्भुत और शिक्षाप्रद कथा सुनाने जा रहा हूं जिसने अपने कर्मों के फल स्वरूप सात जन्मों तक विधवा होने का दुख सहन किया था यह कथा ना केवल हमें अपने कर्मों के महत्व को समझाती है बल्कि यह भी सिखाती है कि सच्ची भक्ति और पश्चाताप से हमें अपने पापों और कर्म से मुक्त हो सकते हैं तो आइए इस कथा में डूबकर हम सभी सीखें और प्रेरणा ले
मित्रों एक समय की बात है कैलाश पर्वत की ऊंची चोटीयों पर देवी पार्वती और भगवान शिव एक साथ बैठे थे हिमालय की शीतल बयार और बर्फ से ढकी चोटीयों के बीच पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा है स्वामी आज मैंने एक बड़ा ही विचित्र दृश्य देखा है आज मैं जब पृथ्वी लोक का भ्रमण कर रही थी तो मैंने देखा कि एक स्त्री वृक्ष के नीचे विलाप कर रही थी वह बेचारी जवानी में विधवा हो गई थी सिर्फ

एक सर्प के काटने से उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी और यम के दूत उसके पति की आत्मा को यमपुरी ले जा रहे थे तब मैंने उन यमदू तों से कहा हे यमदू तों क्यों इस बेचारी स्त्री को जवानी मे विधवा कर रहे हो फिर यमदू तों ने मुझसे कहा हे माता पार्वती हम तो यमराज की आज्ञा का पालन कर रहे हैं यह जो स्त्री है इसके भाग्य में विधवा होना ही लिखा है इसीलि इसका विवाह कम आयु वाले पुरुष के साथ हुआ था
इसके लिए यह स्त्री स्वयं ही कारणीए स्त्री ने जो पाप किए हैं उसी का दंड यह भुगत रही है इस स्त्री को सात जन्मों तक विधवा होने का दंड मिला है यमदू तों के मुख से यह बात सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ उस स्त्री ने ऐसा कौन सा पाप किया था जिस कारण से उस स्त्री को जवानी में ही विधवा होना पड़ा यह जानने की मेरे मन में जिज्ञासा हुई इसीलिए प्रभु मैं आपके पास आई हूं

हे प्रभु अब आप ही मुझे बताइए कि वह कौन सा पाप है जिसे करने पर स्त्री को सात जन्मो के लिए विधवा होना पड़ता है भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया हे पार्वती आपने ठीक ही किया जो यहां पर चली आए आपके प्रश्न के मध्यम से समस्त संसार को यह ज्ञान भी प्राप्त हो जाएगा और आपकी शंका भी दूर हो जाएगी किंतु मैं आपको उस पाप के विषय में बताने से पूर्व एक प्राचीन कथा सुनाता हूं इस कथा का श्रवण करने पर आपको आपके सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे जो भी स्त्री इस कथा का श्रवण करती है

उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह जवानी मे विधवा नहीं बनती है इसीलिए पार्वती आप इस कथा को सुनकर इसका प्रचार अवश्य कीजिए ताकि संसार की समस्त स्त्रियां इसका लाभ उठा सके पार्वती कहते हैं हे प्रभु आपके मुख से यह कथा सुनना तो बड़ा ही सौभाग्य की बात है मैं अवश्य इस कथा को ध्यान से सुनूंगी और इसका तीनों लोकों में प्रचार अवश्य करूंगा
भगवान भोलेनाथ ने माता पार्वती की जिज्ञासा को देखकर कहा हे देवी यह कथा एक स्त्री की है जिसने अपने पापों के कारण सात जन्मों तक विधवा होने का दुख भोगा यह कथा तुम्हें यह सिखाएगी कि कैसे हमारे कर्म हमारे भविष्य को प्रभावित करते हैं इसीलिए इसे ध्यानपूर्वक सुनो पूर्व काल की बात है

विषम पुरी नामक नगर में एक धनवान सेठ भगवान दास रहते थे उनकी पत्नी प्रभावती जो अत्यंत दयालु धर्म परायण और भगवान शिव की अनन्य भक्त थी उसका जीवन पूजा दान और धर्म के कार्यों में समर्पित था प्रभावती अपने पति के साथ सुखी जीवन बिता रही थी उनके पास अपार संपत्ति थी लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख उनका आपसी प्रेम और धर्म के प्रति निष्ठा थी
एक दिन भगवान दास व्यापार के सिलसिले में समुद्री यात्रा पर गए उन्होंने प्रभावती से वादा किया था कि वह जल्दी ही लौट आएंगे लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था समुद्र में भयंकर तूफान आया जिसने उनकी नाव को निगल लिय भगवान दास ने भगवान का स्मरण किया लेकिन उनका समय आ चुका था उनकी नाव डूब गई और उनके साथ सभी व्यापारियों की भी मृत्यु हो गई

प्रभावती को जब यह दुखद समाचार मिला तो उसका जीवन शोक में डूब गया उसका हृदय बुरी तरह टूट गया था उसने सोचा कि नियति ने उसके साथ यह अन्याय क्यों किया फिर उसने अपनी सारी संपत्ति भगवान शिव को समर्पित करने का निर्णय लिया और
विषय पुरी के मंदिर के पुजारी के पास जाकर कहा हे पुजारी जी मैंने जीवन भर धर्म का पालन किया लेकिन अब मेरा जीवन शोक में डूब गया है कृपया इस संपत्ति को भगवान शिव के चरणों में अर्पण करें और इसे धर्म के कार्यों में उपयोग करें पुजारी ने प्रभावती की व्यथा को समझते हुए कहा

मां आपका यह निर्णय असीम पुण्य का कार्य है भगवान शिव आपके दुख को हर और आपको शांति प्रदान करेंगे लेकिन इस दान के बाद भी प्रभावती को शांति नहीं मिली उसके मन में यह प्रश्न था कि उसने ऐसा कौन सा पाप किया था जो उसे इस दुख का सामना करना पड़ रहा था तभी उसने सुना कि महान ऋषि भार्गव जो दिव्य ज्ञान और योग बल के धनी थे वे पास के वन में तपस्या कर रहे हैं
फिर उसन निश्चय किया कि वह उनसे मिलकर अपने दुख का कारण पूछेगी इतना सोचकर वह ऋषि के आश्रम की ओर निकल पड़ी प्रभावती ने ऋषि भार्गव के आश्रम में जाकर उनके चरणों में प्रणाम किया और अपनी पीड़ा प्रकट की उसकी आंखों में आंसू थे और उसका हृदय पीड़ा से भरा हुआ था

प्रभावती ने ऋषि भार्गव से कहा हे ऋषिवर मैंने जीवन में कोई पाप नहीं किया सदैव मैं धर्म का पालन किया और भगवान शिव की भक्ति में जीवन बिताया फिर भी मेरे पति की इतनी जल्दी मृत्यु हो गई अभी तो मुझे संतान भी नहीं हुई और मेरे पति मुझे छोड़कर परलोक चले गए हैं आखिर किस पाप के कारण मुझे विधवा होना पड़ा है
कृपया मुझे बताइए कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ऋषि भार्गव ने उसकी बात ध्यान से सुनी और कहा हे पुत्री मनुष्य के साथ जो कुछ भी होता है वह उसके भाग्य के अनुसार ही होता है उसके भाग्य में जो लिखा होता है वही होता है उसे कोई बदल नहीं सकता किंतु तुमने पूछा है इसीलिए मैं तुम्हारे पूर्व जन्मों के रहस्यों के बारे में जानकर तुम्हें बताता हूं मैं

योग बल की शक्ति से तुम्हारे पूर्व जन्मों का इतिहास जानने का प्रयास करता हूं और फिर ऋषि भार्गव ने अपनी आंखें बंद की और ध्यानत होकर प्रभावती के पूर्व जन्मों को देखने लगे कुछ समय बाद उन्होंने अपनी आंखें खोली और बोले हे पुत्री तुम्हारे पिछले जन्मों में कुछ ऐसे पाप थे जिनके कारण तुम्हें इस जीवन में यह दुख भोगना पड़ा मैं तुम्हें उन सभी जन्मों की कथा सुनाता हूं जिससे तुम्हें अपने वर्तमान दुख का कारण समझ में आएगा तब
प्रभावती ने बोली हे मुनिवर कृपया मुझे मेरे पूर्व जन्मों की कथा अवश्य सुनाइए मैं यह जानने के लिए उत्सुक हूं फिर ऋषि भार्गव कहते हैं हे पुत्री तुम्हारा पहला जन्म देवनाथ नगर नामक नगर मे हुआ था उस समय तुम्हारा नाम कलावती था और तुम एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में जन्मी थी तुमने नंद देव नामक ब्राह्मण से विवाह किया था जो वेदों के ज्ञाता और धर्म के प्रति अडिग थे तुम्हारा जीवन सुखमय था

और तुमने अपने पति के साथ मिलकर धर्म के अनेक कार्य किए लेकिन एक दिन नंद देव पथिक वन से सामग्री लाने के लिए गए तभी उस वन में आकाश से बिजली गिरने के कारण आग लग गई तब वे उस वन में लगी हुई अग्नि में गिर गए और उनकी मृत्यु हो गई तुमने इस जीवन में भी धर्म का पालन किया और
विधवा होकर भगवान की सेवा में लीन हो गई ऋषि भार्गव कहते हैं हे पुत्री अब तुम्हारे दूसरे जन्म की कथा सुनो दूसरे जन्म में तुमने देवपुरी नामक नगर मे जन्म लिया तुम्हारा नाम कनिका था और तुमने एक धनी व्यापारी से विवाह किया रूपनाथ में अपार सफलता पाई लेकिन धन के लोभ में वह सदैव व्यापार के सिलसिले में यात्रा पर रहता था

एक दिन व्यापार के लिए समुद्र पार जाते समय रूपनाथ ने कनिका से कहा हे प्रिय मै यह व्यापार यात्रा संपन्न करके शीघ्र ही लौट आऊंगा और फिर हम दोनों सुख पूर्वक जीवन बिताएंगे कनिका ने उसे विदा करते हुए कहा स्वामी मैं आपकी कुशलता के लिए भगवान से प्रार्थना करती हूं
आप जल्दी लौट आए लेकिन फिर उसकी नाव सागर में भयंकर तूफान में फंस गई और वह वहीं मारा गया तुमने इस जीवन में भी धर्म का पालन किया और विधवा रहकर भगवान की भक्ति की ऋषि भार्गव ने कहा हे

पुत्री अब तुम्हारे तीसरे जन्म के बारे में सुनो तीसरे जन्म में तुमने वाराणसी में प्रीत मोहन नामक एक ब्राह्मण कन्या के रूप में जन्म लिया तुम्हारा विवाह रमाशंकर नामक यज्ञ करता ब्राह्मण से हुआ जो वेदों के गहरे ज्ञाता और अग्निहोत्र के विशेषज्ञ थे तुम्हारा जीवन सुखमय था लेकिन एक दिन यज्ञ के दौरान रमाशंकर को अचानक हृदय आघात हुआ और
उनकी मृत्यु हो गई मृत्यु से पूर्व रमाशंकर ने अंतिम समय में तुमसे कहा है प्रिय मैं जानता हूं कि मेरा समय आ गया है लेकिन तुम्हें धैर्य रखना चाहिए और धर्म के मार्ग पर चलते रहना चाहिए संचिता ने रोते हुए कहा है स्वामी मैं आपके बिना यह जीवन कैसे जिऊंगी लेकिन मैं आपके निर्देशों का पालन करूंगी और धर्म का मार्ग नहीं छोडूंगी ऋषि भार्गव कहते हैं हे

पुत्री इस प्रकार से तुमने इस जीवन में भी धर्म का पालन किया और विधवा होकर भगवान की सेवा में लीन हो गई ऋषि भार्गव ने कहा हे पुत्री अब तुम्हारे चौथे जन्म के बारे में सुनो चौथे जन्म में तुमने हस्तिनापुर के पास के एक नगर में एक क्षत्रिय परिवार में प्रतिभान के रूप में
जन्म लिया तुमने और राणा प्रताप नामक राजा से विवाह किया जो अत्यंत पराक्रमी और धर्म निष्ठ थे तुम दोनों ने एक साथ धर्म और समाज के लिए अनेक कार्य किए फिर एक दिन राणा प्रताप युद्ध के लिए जा रहा था तब उसने युद्ध के लिए प्रस्थान करते समय प्रतिभा न से कहा प्रिय राणा प्रतापमेरा कर्तव्य मुझे युद्ध के मैदान में बुला रहा है

तुम धैर्य रखो और मेरी अनुपस्थिति में राज्य का ध्यान रखो प्रतिभान ने अपनी चिंता प्रकट करते हुए कहा स्वामी मुझे आपके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं है लेकिन मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगी और धर्म का पालन करूंगी लेकिन युद्ध के दौरान वीरसेन ने वीर गति प्राप्त की तुमने इस जीवन में भी
विधवा होकर धर्म का का पालन किया और अपने पति के आदर्शों का अनुसरण किया ऋषि भार्गव ने कहा हे पुत्री अब तुम्हारे पांचवें जन्म के विषय में सुनो पांचवें जन्म में तुमने देवप्रभा नामक एक तपस्विनी के रूप में जन्म लिया तुमने विश्वा नामक ऋषि से विवाह किया जो तप और साधना में लीन रहते थे तुम्हारा जीवन धर्म और तपस्या में बीत रहा था

लेकिन एक दिन जब ऋषि ध्यान स्थ थे एक विषैले सर्प ने डस लिया और उनकी मृत्यु हो गई तुमने इस जीवन में भी विधवा रहकर तप और धर्म का पालन किया विश्वामित्र ने अंतिम समय में देवप्रभा से कहा प्रिय देवप्रभा मेरी तपस्या अब समाप्त हो गई है तुमने सदैव मेरा साथ दिया और मेरी तपस्या में सहयोग किया मैं तुमसे आग्रह करता हूं
कि तुम इसी प्रकार धर्म का पालन करती रहो देव प्रभा ने अश्रु पूर्ण नेत्रों से कहा ऋषिवर आपके बिना यह तपस्या का मार्ग कठिन होगा लेकिन मैं आपके निर्देशों का पालन करूंगी ऋषि भार्गव कहने लगे हे पुत्री अब मैं तुम्हें तुम्हारे छठे जन्म के विषय में सुनाता हूं छठे जन्म में तुमने अयोध्या के एक व्यापारी परिवार में सुर्रूर लिया तुम्हारा विवाह रामनाथ नामक व्यापारी से हुआ जो व्यापार में अत्यंत सफल थे

तुम्हारा जीवन सुखमय था लेकिन एक दिन रामनाथ का रथ एक गहरे खड्डे में गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई तुमने इस जीवन में भी विधवा होकर भगवान की भक्ति की और धर्म का पालन किया ऋषि भार्गव ने कहा हे पुत्री अब मैंने तुम्हें तुम्हारे छह जन्मों के विषय में बताया है
अब मैं तुम्हारे उस जन्म के बारे में बताता हू जो इन छह जन्मों से पहले हुआ था उस जन्म में तुमने ऐसा पाप किया था जिस कारण से तुम्हें सात जन्मों तक विधवा होना पड़ा इसीलिए अब उस जन्म का वृतांत तुम ध्यान से सुनो ऋषि भार्गव ने कहना शुरू कि किया हे
पुत्री तुम्हारे उस जन्म में तुम माधवपुरी नामक नगर में एक धनवान व्यापारी की बेटी थी तुम्हारा नाम सावित्री देवी था सावित्री देवी अत्यंत सुंदर थी लेकिन उसकी सुंदरता के साथ-साथ उसमें अहंकार लालच और कठोरता भी थी उसने कभी धर्म और मर्यादा का पालन नहीं किया और सदैव अपने सुख और इच्छाओं को पूरा करने में लगी रही हे

पुत्री अब सावित्री देवी की कथा को सुनो सावित्री देवी के पिता ने उसका विवाह एक अत्यंत गुणवान धर्म पराया और सदाचारी युवक सोमनाथ से करा दिया सोमनाथ ने सत्यवादी दयालु और भगवान के अनन्य भक्त थे वह सदैव सावित्री देवी का सम्मान करते और उसे सुखी रखने का प्रयास करते थे
लेकिन सावित्री देवी को उनका यह धार्मिक और सरल स्वभाव पसंद नहीं था वह हमेशा उनसे असंतुष्ट रहती और उनका अपमान करती थी एक दिन सावित्री देवीने सोमनाथ से क्रोधित होकर कहा तुम्हारी यह धार्मिकता और सादगी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है ना तुम्हारे पास धन है ना ही तुम मुझे वह सुख दे पाते हो जिसकी मैं हकदार हूं

मैं इस नीरस जीवन से तंग आ चुकी हूं सोमनाथ ने शांत स्वर में उत्तर दिया सावित्री देवी धन और सुख सुविधाएं जीवन का सार नहीं है सच्चा सुख धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने से मिलता है मैं तुम्हें संसार सुख देने में भले ही असमर्थ हूं लेकिन मैं तुम्हारे प्रति सच्चा और समर्पित हूं लेकिन सावित्री देवी ने उनकी बातों को अनसुना कर दिया और
अपने मन में उनके प्रति और भी कटुता भर ली फिर कुछ समय बाद सावित्री देवी की मुलाकात एक धनी और आकर्षक युवक विक्रम से हुई विक्रम अपने धन और ऐश्वर्य के लिए प्रसिद्ध था लेकिन उसका चरित्र दूषित था सावित्री देवी सोमनाथ के धन और शानो शौकत से प्रभावित होकर उसके प्रति आकर्षित हो
गई फिर एक दिन सावित्री देवी ने अपने पति धर्मपाल से कठोरता से कहा मैं आपके साथ एक और पल नहीं रह सकती मैं सोमनाथ के साथ जीवन बिताना चाहती हूं जहां मुझे वह सब मिलेगा जिसकी मैंने हमेशा से कामना की है धर्मपाल ने दुखी होकर कहा सावित्री देवी तुम जो कर रही हो वह धर्म और मर्यादा के विरुद्ध है

तुम्हारा यह कदम तुम्हारे और हमारे दोनों के लिए विनाशकारी होगा मैं तुम्हें प्रार्थना करता हूं कि इस पथ पर ना जाओ लेकिन सावित्री देवी ने उनकी बातों को तुच्छ समझा और देव शर्मा के साथ भाग गई गई उसने समाज धर्म और अपने कर्तव्यों की परवाह किए बिना अपने सुख के लिए यह कदम उठाया सावित्री देवी ने देव शर्माके साथ उसके आलीशान घर में निवास करने लगी देव शर्मा ने सावित्री देवी से प्रेम नहीं करता था
वह तो केवल उसका उपभोग करना चाहता था उसने सावित्री देवी की मूर्खता का फायदा उठाते हुए उसके साथ अनेक बार संबंध बनाया किंतु सावित्री देवी यह नहीं जानती थी कि देव शर्मा केवल उसका उपभोग कर रहा था देव शर्मा के साथ कुछ समय बिताने के बाद एक दिन सावित्री देवी ने देखा कि देव शर्मा अन्य एक सुंदर स्त्री को अपने घर में लेकर आया है

और वह उसके साथ विहार कर रहा है यह दृश्य देखकर सावित्री देवी को समझ में आया कि देव शर्मा वास्तव में एक दुष्ट और स्वार्थी व्यक्ति है सोमनाथ ने को केवल अपने सुख के लिए इस्तेमाल किया और फिर उसे छोड़ दिया इस अपमान और धोखे से सावित्री देवी बहुत दुखी हुई उसे बड़ा पश्चाताप होने लगा उसने अपनी मूर्खता के कारण अपने के साथ विश्वासघात किया था
लेकिन अब समय हाथ से जा चुका था उसके पास कोई रास्ता नहीं बचा था फिर एक दिन इस असहाय और अपमान से दुखी होकर सावित्री देवी ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली ऋषि भार्गव कहते हैं हे पुत्री उस जन्म में जब सावित्री देवी के रूप में तुम्हारी मृत्यु हुई तो यमदूत तुम्हें यमराज के समक्ष ले गए यमराज ने तुम्हारे पाप कर्मों को देखकर क्रोधित होकर कहा हे

सावित्री देवी तुमने अपने धर्म परायण पति का त्याग करके अधर्म का मार्ग चुना तुमने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया और अपने अहंकार और लालच के कारण अनेक पाप किए हैं जो स्त्री अपने सत्यवादी और धर्म परायण पति का त्याग करके पर पुरुष के पास चली जाती है उसे महापाप लगता है इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं
कि अगले सात जन्मों तक तुम विधवा रहोगी और अपने पापों का फल भुगतो होगी सावित्री देवी ने पश्चाताप करते हुए यमराज से क्षमा मांगी हे यमराज मैंने अपने अज्ञान लोभ और अहंकार में यह पाप किया कृपया मुझे क्षमा करें और मुझे इस श्राप से मुक्त करें यमराज ने कठोर स्वर में कहा हे सावित्री देवी पश्चाताप के लिए अब बहुत देर हो चुकी है
तुम्हें अपने कर्मों का फल भोगना ही होगा लेकिन यदि तुम अगले सात जन्मों में सच्ची भक्ति और धर्म का पालन करोगी तो तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा ऋषि भार्गव ने कहा हे पुत्री इस प्रकार से उस जन्म में सावित्री देवी के रूप में तुमने जो पाप किया था उसी पाप के कारण तुम्हें सात जन्मों तक विधवा होना पड़ा है अब यह तुम्हारा सातवां और अंतिम जन्म है इस जीवन में तुमने धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलकर अपने पापों का प्रायश्चित किया है अब तुम इस पाप से मुक्त हो
जाओगी और तुम्हें अगले जन्म में सुख और शांति प्राप्त होगी सुहासिनी ने ऋषि के चरणों में गिरकर कहा ऋषिवर आपने मेरे जीवन का रहस्य खोल दिया अब मैं इस जीवन में भगवान शिव की भक्ति में और अधिक गहराई से डूब जाऊंगी फिर ऋषि भार्गव ने सुहासिनी के मंगल की कामना करते हुए उसे आशीर्वाद दिया और कहा हे

पुत्री तुमने इन सात जन्मों में कोई पाप नहीं किया है सदा ही पुण्य के काम किए इसीलिए अब तुम्हारा कल्याण ही होगा फिर सुहासिनी ऋषि के आश्रम से लौटकर अपने घर पर आ गई ऋषि भार्गव के आश्रम से लौटने के बाद सुहासिनी का जीवन पूरी तरह से बदल गया अब वह अपने जीवन के हर क्षण को
भगवान शिव जी की भक्ति और धर्म के कार्यों में समर्पित करने लगी उसका हृदय शांत था और उसने अपने जीवन में मिलने वाले दुखों को भगवान का प्रसाद मानकर अपने जिवन को स्वीकार कर लिया वह जान चुकी थी कि उसके पिछले जन्मों के पापों का फल ही उसे इस जन्म में भोगना पड़ा रहा था लेकिन अब उसे मुक्ति की प्राप्ति होने वाली थी
विषम पुरी के लोग सुहासिनी की भक्ति और धर्म निष्ठा की सराहना करते थे उसने अपने जीवन का हर क्षण दान सेवा और भक्ति में लगा दिया धीरे-धीरे उसके शारीरिक जीवन की अंतिम घड़ियां भी आ पहुंची अपने अंतिम समय में भी सुहासिनी ने भगवान शिव का स्मरण किया और उनके चरणो में अपने जीवन को समर्पित किया सुहासिनी ने अपने अंतिम क्षणों में अपने आसपास के लोगों से कहा मेरे
प्रियजनों अब मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी सीखा वह यही है कि धर्म और सत्य का मार्ग ही सही मार्ग है भगवान शिव की कृपा से मुझे इस जीवन में अपने पापों का प्रायश्चित करने का अवसर मिला मैं आप सभी से यही आग्रह करती हूं कि आप भी अपने जीवन में धर्म का पालन करें और
भगवान की भक्ति में लीन रहे और फिर भगवान शिव के नाम का उच्चारण करते हुए सुहासिनी ने इस संसार से विदा ली और जैसे ही उसका जीवन समाप्त हुआ उसका आत्मा एक दिव्य प्रकाश में विलीन हो गई और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई उसके पिछले जन्मों के सारे पाप समाप्त हो गए और वह अपनी आत्मा की शांति के लिए

भगवान शिव के परम धाम में स्थान प्राप्त कर गई कथा समाप्त करते हुए दोस्तों भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा हे पार्वती यह कथा इस बात का प्रमाण है कि मनुष्यों को उनके कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है लेकिन धर्म और भक्ति मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जा सकते हैं
सुहासिनी ने अपने पापों का प्रायश्चित कर लिया और अब वह अपने अगले जन्म में सुख और शांति प्राप्त करेगी माता पार्वती ने भगवान शिव के चरणों में सिर झुकाकर कहा हे माधव आपकी कथा से मुझे महान प्रेरणा प्राप्त हुई है मैं इसे अवश्य ही अन्यत्र सुनाकर धर्म का प्रचार अवश्य करूंगा तो यह कथा हमें यह सिखाती है
कि हमारे कर्मों का फल हमें अवश्य मिलता है लेकिन ईश्वर की भक्ति और धर्म का पालन हमें हर प्रकार के पाप से मुक्ति दिला सकता है तो मित्रों उम्मीद है आपको यह कथा पसंद आई होगी कमेंट करके जरूर बताएं जानकारी अच्छी लगी तो वीडियो को लाइक जरूर करें और कमेंट में जय भोलेनाथ अवश्य लिखें साथ ही चैनल को सब्सक्राइब करे आप सभी का धन्यवाद