नमस्कार दोस्तों स्वागत है क्या आप भी सुबह 8:00 बजे के बाद स्नान करते हैं या उससे पहले तो आपको भगवान विष्णु ने
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने देवी लक्ष्मी और गरुड़ जी को स्नान करने के विषय में जो रहस्य बताया है
Table of Contents
https://youtu.be/5Aqm8q2vszE?si=3uePCzZ6WfxzYQRP
उसे अवश्य ही सुनना चाहिए।स्त्री को कब नहाना चाहिए
स्नान कब करना चाहिए? और कैसे करना चाहिए?
स्नान करते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
शाम को नहाना चाहिए या नहीं
नहाने के पानी में किस दिन क्या डालना चाहिए?
तथा स्नान के बाद सबसे पहला काम क्या करना चाहिए?
https://youtu.be/y5M8w_peHhA?si=D94aqnYOptQa_-d5
जिससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़े, दुख दरिद्रता का नाश हो जाए और सुख समृद्धि में वृद्धि हो।
स्नान के सभी शुभ फलों को प्राप्त करने के लिए स्नान की सही विधि क्या है?
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने भगवान विष्णु ने स्नान करने के विषय में बताया है कि स्नान कोई देह को स्वच्छ करने मात्र वाली क्रिया नहीं है।
इसके सहस्त्र लाभ हैं। यदि सही विधि से स्नान किया जाए तो मनुष्य जीवन में कभी रोगी नहीं होगा।
कभी दुखी नहीं होगा और कभी दरिद्री नहीं रहेगा।
भगवान विष्णु ने स्नान के विषय में कौन सा महत्वपूर्ण ज्ञान देवी लक्ष्मी और गरुड़ जी को दिया है।

एक बार क्षीर सागर में शेषनाग की शया पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी विराजमान थे। उसी क्षण आकाश मार्ग से विता पुत्र
गरुड़ वहां आ पहुंचे। गरुड़ ने दूर से ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को दर्शन करते हुए विनम्रता पूर्वक प्रणाम किया और समीप आए। भगवान विष्णु ने मृदु मुस्कान के साथ आंखें खोली और गरुड़ का स्वागत किया।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने गरुड़ ने हाथ जोड़कर कहा हे प्रभु नारायण हे माता महालक्ष्मी आपको कोटि-कोटि प्रणाम। भगवान विष्णु ने प्रेम पूर्वक गरुड़ से पूछा हे गरुड़ तुम्हारा स्वागतहै।
तुम्हारे चेहरे पर शंका दिखाई पड़ रही है।
बताओ तुम्हारी निराशा का क्या कारण है?
गरुड़ उत्सुकता पूर्ण स्वर में बोला हे ।

प्रभु मैं अभी-अभी पृथ्वी लोक का भ्रमण करके लौटा हूं। अनेक मनुष्यों को देखा जो प्रतिदिन स्नान तो करते हैं फिर भी दुखी और क्लेश पूर्ण जीवन जीते हैं।
वे मनुष्य प्रतिदिन प्रातः स्नान करते हैं।
फिर भी उनके दुर्दिन दूर क्यों नहीं होते?
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने उनके दुखी रहने का क्या कारण है?
कुछ क्षण रुककर गरुड़ ने दूसरी जिज्ञासा प्रकट की। हे प्रभु, कृपया मुझे यह बताइए कि स्नान करने की सर्वोत्तम विधि क्या है?
मनुष्य को स्नान कब और कैसे करना चाहिए? फिर गरुड़ ने माता लक्ष्मी की ओर देखकर कहा, हे ।
मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक में अनेक स्त्रियां नित्य प्रति स्नान कर आपकी पूजा अर्चना करती हैं। किंतु फिर भी उनके घर में आपका वास नहीं होता। उनके जीवन में दरिद्रता और अशांति बनी रहती है।
ऐसा क्यों? गरुड़ के मुख से एक के बाद एक प्रश्न सुनकर भगवान विष्णु मंदमंद मुस्कुराए। माता लक्ष्मी ने भी गरुड़ की जिज्ञासा को सराहना भरी दृष्टि से देखा शाम को नहाने से क्या होता है।
भगवान विष्णु गंभीरता से बोले हे पक्षीराज तुम्हारे सभी प्रश्न उचित हैं।

तुमने अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर प्रश्न किया है।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने स्नान मानव जीवन का एक अनिवार्य कर्म है। स्नान से ही शरीर और मन की शुद्धि होती है और मनुष्य पूजा पाठ जैसे पवित्र कर्मों के योग्य बनता है।
प्रतिदिन स्नान करना अत्यंत आवश्यक है। परंतु सही विधि और समय का पालन न करने पर उसका पूर्ण फल नहीं मिलता।
हे गरुड़ मैं तुम्हारे सभी प्रश्नों का उत्तर दूंगा। किंतु सीधे उत्तर बताने से पहले मैं तुम्हें एक पावन कथा सुनाता हूं।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने इस कथा को ध्यान से सुनो। इसमें छिपे ज्ञान से तुम्हारे समस्त संदेह दूर हो जाएंगे।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने गरुड़ जी ने उत्सुकता प्रकट करते हुए कहा, हे प्रभु, आपके मुख से इस कथा का श्रवण करना मेरा सौभाग्य है।

कृपया मुझे वह कथा सुनाइए। मैं इसे ध्यान से पूरा सुनूंगा।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने भगवान विष्णु गरुड़ जी को वह कथा सुनाते हैं जो आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूं। इस कथा को सुनने मात्र से ही समस्त तीर्थों में एक साथ स्नान करने का पुण्य मिलता है। इसीलिए आप इस कथा को ध्यान से पूरा जरूर सुने। प्राचीन काल की बात है। मध्य देश में एक अत्यंत सुंदर नगर बसा हुआ था।
उस नगर में एक परम धनवान सेठ निवास करता था। उस सेठ के वैभव की चमक दूर-दूर तक फैली थी। उसके महल जैसे घर में किसी भौतिक सुख की कमी ना थी। ईश्वर की कृपा से उसके यहां तीन सुंदर कन्याओं ने जन्म लिया था।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने सेठ ने अपनी तीनों पुत्रियों को बड़े लाड़ प्यार से पाला। उनकी हर इच्छा पूरी की जाती। उन्हें रेशमी वस्त्र, आभूषण और सुख सुविधाओं से भरपूर जीवन मिला।
तीनों बहनें रूप और यौवन में अनुपम थी और चंचल स्वभाव से सबका मन मोह लेती थी।

किंतु अपनी संतानों को अपार सुख देने के उत्साह में सेठ एक बात भूल गया। उसने अपनी पुत्रियों को धर्म और शास्त्रों का ज्ञान नहीं सिखाया। वे जीवन के आध्यात्मिक और नैतिक पक्ष से अनभिज्ञ रही। फल स्वरूप, धन, वैभव, सौंदर्य और सुख होते हुए भी उन कन्याओं का जीवन अधूरा था।
शास्त्र ज्ञान के अभाव में उन्हें उचित अनुचित का भेद समझ में नहीं आया। समय के साथ तीनों कन्याएं यौवन की दहलीज पर पहुंच गई। सेठ ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उनका विवाह सुयोग्य वरों से तय कर दिया। तीनों का ब्याह बड़े धूमधाम से नगर के प्रतिष्ठित और धना परिवारों में हुआ।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने वे अपने अपने ससुराल के राजमहलों में आदर और प्रेम के साथ ग्रहण की गई। परंतु विलासिता और लापरवाही के चलते उनकी कुछ आदतें बिगड़ की थी। तीनों बहुएं सुबह देर तक सोई रहती। सूर्योदय को भी चादर ओढ़े पड़े रहती।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने जब उनकी आंख खुलती तो दिन चढ़ आया होता। वे आलस्य से देर से उठती और प्रातः स्नान में कोताही बरतती। कई बार बिना स्नान किए ही रसोई घर की ओर रुख कर लेती और भोजन ग्रहण कर लेती। पूजा पाठ तो कभी कभार वह भी बेमन से करती।
उनके ससुराल में बड़ी बुजुर्ग महिलाओं ने कई बार उन्हें टोकने का प्रयत्न किया। किसी की सास ने प्यार से समझाया, बेटी सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लिया करो। बिना स्नान कुछ मत खाया करो। पर तीनों बहनों ने अपनी सास की बात को अनसुरा कर दिया। समय बीतने लगा और जल्द ही उन घरों में अशुभ परिवर्तन दिखाई देने लगे।
एक के बाद एक व्यापार में घाटे होने लगे। कभी माल की चोरी हो जाती तो कभी बड़ा निवेश डूब जाता। स्थिति यहां तक पहुंची कि उन परिवारों को अपनी जायदाद एक-एक कर बेचनी पड़ी।
महलों के वैभव को त्याग कर अब वे साधारण झोपड़ी में रहने को विवश हो गए। परंतु वे तीनों बहनें तन्हाली और कष्टमय जीवन सहने को तैयार नहीं थी। अंतः वे अपनी ससुराल छोड़कर लौटकर अपने पिता के घर आ गई।
अचानक तीनों पुत्रियों को द्वार पर देख सेठ चकित रह गया।

सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने परंतु उसने बाहें फैलाकर उनका स्वागत किया। बेटियों के वापस आ जाने से सेठ को आत्मिक शांति मिली।
किंतु जल्द ही उसने गौर किया कि उनकी दिनचर्या अब भी नहीं बदली थी। मायके में भी वे पहले की तरह देर से सोकर उठती और बिना नहाए आराम से रसोई से भोजन ले लेती।
इधर पिता अपनी ओर आती विपत्ति से अनजान था। कुछ ही समय में सेठ के व्यापार में भी अजीब कठिनाइयां आने लगी। सौदे विफल होने लगे। बाजार में उसकी विश्वसनीयता घटने लगी और धन हानि का सिलसिला शुरू हो गया। अंतः हताश होकर सेठ ने ईश्वर का स्मरण किया।
एक रात वह सितारों भरे आकाश की ओर देखकर बोला हे प्रभु यह कैसी विपत्ति है मेरा तो सब कुछ उजड़ता जा रहा है कोई राह दिखाओ उस दुख भरी पुकार के कुछ ही समय बाद एक दिन सेठ के द्वार पर एक दिव्य तेजस्वी साधु पधारे साधु वेशधारी कोई और नहीं स्वयं भगवान विष्णु थे जो सेठ की विपदा हरने मानव रूप में आए थे।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने सेठ भागा हुआ आया और श्रद्धा पूर्वक साधु महाराज को भीतर आमंत्रित किया। दिव्य पुरुष ने सेठ के मुख की उदासी को ताड़ लिया और स्नेह भरे स्वर में पूछा वत्स तुम्हारे चेहरे पर चिंता की रेखाएं स्पष्ट हैं।
मुझे अपने हृदय का दुख बताओ। सेठ ने अवरुद्ध कंठ से अपनी आपबीती सुना डाली। उसने अपनी बेटियों को भी पास बुला लिया। साधु ने ध्यान मग्न दृष्टि उन तीनों पर डाली। कुछ पल में ही उन्हें दिव्य ज्ञान से सब भेद दिख गया।
उन्होंने देखा कि उन बहनों के चारों ओर घोर तिमिर का एक नकारात्मक घेरा मंडरा रहा है। साधु ने गंभीर स्वर में सेठ से कहा, वत्स, तुम्हारी इन तीनों पुत्रियों की अपनी ही आदतों ने इनका भाग्य बिगाड़ा है।
इनकी आलसी दिनचर्या और अशुद्ध आचरण के कारण ही इनके चारों ओर दुर्भाग्य ने घेरा बनाया है। यह सुबह देर से उठती हैं। सूरज उगने के काफी बाद आलस्य से स्नान करती हैं या कभी-कभी बिना स्नान भोजन कर लेती हैं। उनके इस अशुद्ध आचरण ने इनके चारों ओर तमस का कवच खड़ा कर दिया है।
तीनों बहनें लज्जा और पछतावे से सिर झुकाए खड़ी थी।

सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने उन्हें अपनी भूल का आभास होने लगा था। साधु महाराज ने शास्त्रों का वर्णन करते हुए समझाया स्नान कई प्रकार के होते हैं। मुख्यतः चार प्रकार के शुभ स्नान बताए गए हैं। ब्रह्मा स्नान, देव स्नान, ऋषि स्नान और मानव स्नान अशुभ माना गया है। ब्रह्मा स्नान, ब्रह्मा मुहूर्त सूर्योदय से लगभग डेढ़ से दो घंटे पूर्व में किया गया स्नान सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस समय वातावरण में अद्भुत ऊर्जा व्याप्त रहती है। यह स्नान मनुष्य के लिए सबसे पुण्यदाई होता है
सुबह 5:00 नहाने से क्या फायदा होता है.और जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाता है। देव स्नान प्रातः 5:00 से 6:00 बजे के मध्य किया जाने वाला स्नान देव स्नान कहलाता है। इस समय स्नान करने से मानव के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है
12:00 के बाद नहाने से क्या होता है.और धन संपदा की वृद्धि होती है। ऋषि स्नान सुबह भोर में जब आकाश में कुछ तारे अब भी चमक रहे होते हैं। उस वेला में जो स्नान किया जाए उसे ऋषि स्नान कहते हैं। यह मानसिक शांति प्रदान करता है। मानव स्नान सुबह 6:00 से 8:00 बजे के बीच अर्थात सूर्योदय के समय या उसके तुरंत बाद जो स्नान किया जाए उसे मानव स्नान कहा गया है। यह स्नान भी शुभ फलदाई है और शरीर को दिन भर ताजगी देता है।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने दानव स्नान साधु का स्वर अब गंभीर हो उठा। परंतु यह भी ध्यान रखने योग्य है कि सुबह 8:00 बजे के बाद किया गया स्नान दानव स्नान की श्रेणी में आ जाता है। यह अनुचित और अशुभ होता है। ऐसे स्नान करने वाले मनुष्य के तन मन में उत्साह और शक्ति का अभाव रहता है
गूगल हफ्ते में कितनी बार नहाना चाहिए

सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने और दुर्भाग्य उनका पीछा करने लगता है। साधु ने सेठ की ओर देखकर कहा तुम्हारी यह तीनों पुत्रियां प्रातः समय पर स्नान नहीं करती थी। इसी कारण इनके ससुराल की सारी समृद्धि नष्ट हो गई और अब इन्हीं की वजह से तुम्हारे घर की लक्ष्मी भी रूठ रही है।
तीनों बहनें रोते हुए साधु के चरणों पर गिर पड़ी।
महाराज हमसे भूल हो गई। हमें क्षमा करें और उचित मार्ग दिखाइए। साधु ने गंभीर स्वर में कहा, अब मैं तुम्हें स्नान के समय बोला जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्र बताता हूं।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने इसे स्मरण करो। जो भी इस मंत्र का उच्चारण करते हुए स्नान करता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। गंगेच यमुने च गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन सन्निधि कुरु साधु ने मंत्र का अर्थ बताते हुए
कहा इसका भाव यह है कि हे पवित्र नदियों गंगा यमुना गोदावरी सरस्वती नर्मदा सिंधु और कावेरी आप सब इस स्नान के जल में विराजमान हो। भगवान विष्णु रूपी उस सिद्ध साधु ने
यह कथा सुनाकर और समस्त विधियां समझाकर सेठ और उसकी पुत्रियों को मार्ग दिखा दिया।

सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने तीनों बहनों की आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए। साधु रूप में आए प्रभु ने प्रसन्न होकर तीनों को आशीर्वाद दिया और अंतर्धान हो गए।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने इसके पश्चात तीनों बेटियां अपने ससुराल लौट गई। उन्होंने प्रभु द्वारा बताए गए स्नान के नियमों का कठोरता से पालन शुरू कर दिया। वे रोज तड़के ब्रह्मा मुहूर्त में स्नान करती। धीरे-धीरे उनके पतियों के डूबते व्यापार को फिर से सहारा मिलने लगा। घर में धन की बरकत लौट आई और खोया वैभव पुनः प्राप्त हो गया। भगवान विष्णु यह कथा सुनाकर मौन हुए। गरुड़ मंत्रमुग्ध से यह सब सुनते रहे थे।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने अब उन्हें अपने सभी प्रश्नों का उत्तर मिल चुका था। माता लक्ष्मी ने कोमल स्वर में जोड़ते हुए कहा, जहां आलस्य, गंदगी और अशुद्धि रहती है, वहां मेरा वास नहीं हो सकता। मैं वहीं निवास करती हूं जहां भोर के प्रकाश के साथ जागरण होता है। स्नान से तन मन पवित्र रखे जाते हैं और सच्ची श्रद्धा से ईश्वर का स्मरण होता है।
गरुड़ ने हर्ष भरी विनम्रता के साथ भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रणाम किया।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने उसने ऊंचे स्वर में जयकार किया। जय श्री हरि विष्णु। जय मां लक्ष्मी। आपकी कृपा से आज मेरा चित्त प्रकाश से भर गया। इसलिए हमें भी आलस्य त्याग कर नित्य प्रति सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करना चाहिए।
सुबह 8 बजे के बाद स्नान करने तब ईश्वर की आराधना एवं स्मरण करने से हमारे जीवन में सदा पवित्रता, सकारात्मक ऊर्जा और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी। दोस्तों, आपको यह कथा कैसी लगी? कमेंट करके अवश्य बताएं। जानकारी अच्छी लगी तो इस लेख को साझा जरूर करें। आप सभी का धन्यवाद।














